साहित्य – साहित्य समाज का केवल प्रतिक्रियाशील नहीं बल्कि मार्गदर्शी दर्पण भी है जिसके प्रकाश में मानवता का आगे का मार्ग आलोकित होता है। जड़ दर्पण में तो वस्तु जस की तस झलकती है, लेकिन चेतन यानी साहित्यिक दर्पण में वस्तुओं एवं स्वभावों की वांछनीयता-अवांछनीयता आदि पक्षों के बारे में निर्णायकता भी देखने को मिलती है। यही कारण है कि प्रत्यक्ष रूप से सामने दिखनेवाला समाज निराश कर भी सकता है परंतु साहित्य की निधि में तेजस्विता होती है। वह समाधान न भी दे सके, तो भी विचार, संघर्ष अथवा मार्ग खोजने की छटपटाहट पैदा करती है। उसमें यथातथ्यता भी होती है, उदात्तता भी। हालांकि साहित्य सागर जितना विराट और अगाध विषय है, फिर भी इस खंड में हमारा प्रयास ऐसी सामग्री उपलब्ध कराते रहने का होगा जिससे अपने समय से हम और अधिक अंतरंगता के साथ जुड़ सकें और अतीत से भी उतना ही लें जो हमें हमारे वर्तमान में और भी अच्छी तरह प्रतिष्ठित करता हो। साहित्य का लोकोपयोगी स्वरूप कैसा होगा, साहित्य में जन-जन की रुचि कैसे हो, साहित्य के प्रकाशन के सरल उपाय कैसे निकाले जाएँ और श्रेष्ठ साहित्य की बानगी कैसी हो सकती है – ये ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर खोजने के लिए यह खंड समर्पित किया गया है।
क्या हम सही दिशा में सोच रहे हैं?
चिंतन का विषय - शुरू शुरू में जब समझदारी एक नयी-नयी चीज़ की तरह दिखायी देती थी, तब मैंने जीवन का एक कामचलाऊ प्रारूप बना लिया था, जो जीवन ...






0 comments:
Post a Comment