Sunday, 20 January 2019

क्या हम सही दिशा में सोच रहे हैं?

चिंतन का विषय

- शुरू शुरू में जब समझदारी एक नयी-नयी चीज़ की तरह दिखायी देती थी, तब मैंने जीवन का एक कामचलाऊ प्रारूप बना लिया था, जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त औसतों से बना एक खाका था। आजकल के रंग-ढंग की शिक्षा ने मन में यह बात अच्छी तरह से बैठा दी थी कि जीवन में किसी भी तरफ बहुत आगे जाने के भाव को ज्यादा भाव नहीं देना है! एक सीमा के बाद प्रत्येक विचार में, गतिविधि में, क्रिया में जोखिम का क्षेत्र शुरू होने लगता है। इसलिए साहस में, श्रेष्ठता में, यहाँ तक कि अच्छाई में भी बहुत बेबाक होना समझदारी में नहीं आता – ऐसी मेरी धारणा बन गई थी। और इस प्रकार की धारणा जिन लोगों में होती है, वे समाज से एक तरह का सूक्ष्म भय खाते हैं, जिसका अक्सर उन्हें पता नहीं रहता। मैं भी इसका अपवाद नहीं था – इन संदर्भों में समाज मेरे गुरु समान था – संकल्पना के रूप में! समाज का यह गुरुत्व उसमें निहित किसी स्वयंचेतन-तत्व का परिणाम नहीं था, उस अर्थ में जिस अर्थ में ज्ञान की आत्मनिर्भरता को माना जाता है। मान लिया गया था कि समाज में स्वाभाविक रूप से इस प्रकार की एक ऐहिक क्षमता विद्यमान रहती है, और जिसे मान लेना ही श्रेयस्कर होता है। सो मान लिया गया था। बहुत बाद में पता चला कि जिसे एक स्वाभाविक ज्ञान के रूप में मान्यता प्रदान कर दी गई थी, उसी मान्यता के रास्ते अज्ञान को भी, बल्कि प्रधानत: उसको ही मानस में प्रवेश मिल रहा था। बहुत बाद में यह खोज हो पायी और तब तक अज्ञान काफी उठा-पटक करने में कामयाब भी हो चुका था।

जब यह सब रहस्य उद्घाटित हो ही गया तो मानस की छानबीन करके देखा गया कि गड़बड़ हो कहाँ रही है? तब पिछले आग्रहरहित चिंतनों के पुण्यों के प्रबल प्रताप से चीज़ें पहले से कुछ अधिक स्पष्ट रूप में अनुभव में आयीं। सबसे पहले तो यह समझ में आया कि यह जो समाज में एक स्वाभाविक चेतन तत्व-- जो स्वायत्तता की दृष्टि से व्यक्तित्व न भी हो तो व्यक्तित्व का स्थानापन्न हो, समतुल्य हो—मान लिया गया था जो कि समाज की तथाकथित अंतर्निहित संरचना के फलस्वरूप प्रकट हो उठता है – इसी, ठीक इसी मान्यता में गफलत थी। व्यक्तित्व के चरित्र को समझने में भूल हो रही थी। औसतों के मेल-मिलाप से कभी भी चेतन व्यक्तित्व तो क्या, उसके जैसा, उसका शंताश, सहस्रांश भी स्वरूप ग्रहण नहीं कर सकता, जबकि ऐसी किसी अभिकल्पित चेतन सत्ता को मान्यता दे दी गयी थी। समाज कितना भी बड़ा हो, विशाल हो, सूचनाओं और भावनाओं का आगार हो, लेकिन वह एक व्यक्तित्व, एक चेतन सत्ता का स्थानापन्न नहीं हो सकता – कभी नहीं हो सकता। यह एक बहुत बड़े आविष्कार के रूप में चित्त-पटल पर अंकित हो गया।

वास्तव में तभी समझ आया कि जड़वादी होने का क्या अर्थ है? जड़ में से चेतन नि:सृत होता है, इस प्रकार की धारणाओं को जड़वादी चिंतन का उत्स मानना चाहिए। जैसा पहले कहा, चूंकि समाज देश-काल-निमित्त के विस्तार में भांति-भांति की बौद्धिक प्रवृत्तियों का एक गतिमय संग्रहालय है, संस्कारराशि है, मानवीय अनुभवों का स्मृतिकोष है – इसलिए वह चेतन है या चेतना को उद्दीप्त कर सकता है—यह मान लिया गया था – और ठीक यहीं पर भूल थी, अज्ञान था! ऐसा कभी नहीं हो सकता। समाज कितना भी विशाल आगार हो – वह कभी भी स्वयंचेतन नहीं हो सकता, चेतना को प्रकट नहीं कर सकता, उसके विश्लेषण के परिणाम कभी भी औसतों के चंगुल से परे नहीं हो सकते, ना ही वे कोई सर्वथा नवीन उद्भावना को उत्तोलित कर सकते हैं। वैज्ञानिक आईंस्टीन के शब्दों में कहें तो समाज को ‘बोध’ नहीं हो सकता। चेतन अनुभूति, उसका प्रकटना, उसकी परिकल्पना करना तो दूर, समाज उसका स्वप्न भी नहीं ले सकता। इन सभी व्यापारों के लिए एक व्यक्तित्व, चेतन व्यक्तित्व का होना आवश्यक है, जो समाज को – उसके विशाल होने, अनुभवों का उपादान होने को चेतन रूप से अनुभव कराये। एक जगह स्वामी विवेकानन्द ने बड़ा रोचक उदाहरण दिया है। उनके कहने का भाव यह है कि रेल का इंजन भभक रहा है, ताकत से आगे बढ़ने के लिए तैयार है, सीटी दे रहा है, और उसके सामने एक कीड़ा पटरी पर बैठा मानो उसे ललकार रहा है, उसकी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह कर रहा है!

संस्कृत में कर्ता की परिभाषा की गयी- स्वतंत्र: कर्ता! इस कर्ता के अर्थ में समाज को कभी भी नहीं लिया जा सकता। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि समाज अपने अस्तित्व, अपनी परिकल्पना तक के लिए भी किसी व्यक्तित्व पर परावलंबित है – चाहे वह व्यक्तित्व छोटा हो या बड़ा। जैसे कोई कार बिना चाबी के चलना शुरू भी नहीं कर सकती, ऐसे ही चेतन व्यक्तित्व के स्पर्श के बिना समाज के किसी भी पुर्जे में हरकत नहीं आ सकती।

यह भूल कोई छोटी भूल नहीं थी। अत: इसका प्रायश्चित भी छोटा-मोटा नहीं किया जा सकता था। सोचा तो लगा कि गलती से वही कर रहे थे जो स्वामीजी ने कहा था – बैलों के आगे गाड़ी जोतना! समाज को प्रेरक मानना और व्यक्ति को प्रेरित! समाज व्यक्ति को निस्संदेह प्रेरित कर सकता है, लेकिन तभी जब व्यक्ति में प्रेरित होने की स्फुरणा बीज-रूप में पहले से विद्यमान हो। ऐसा नहीं हो सकता कि समाज-रूपी कोई स्वतंत्र चेतना व्यक्तियों में प्रवेश कर जाये और उन्हें उद्दीप्त कर दे। यह व्याख्या सही नहीं हो सकती। बारिश खूब जोरों से हो सकती है, लेकिन यदि धरती की मिट्टी में बीज न हों तो धरती हरी-भरी नहीं होगी। समाज अपनी समग्र स्थितियों के साथ अनुकूल या प्रतिकूल हो सकता है, लेकिन कर्तारूप से प्रेरक नहीं हो सकता। कई बार पहले भी मैंने लिखा है कि लंबे समय से, बल्कि कई पीढ़ियों से दमित दलित चले आ रहे लोग एकाएक क्रांति कर बैठते हैं और समाज व्यवस्था बदल जाती है। यदि समाज में कर्तास्वरूप प्रेरक शक्ति विद्यमान हो तो ऐसा कैसे हो सकेगा, क्योंकि इसका अर्थ होगा कि उस जगह व्यक्ति समाज की प्रेरणा के विरुद्ध गये और अपना उद्धार किया! यहाँ केवल अनुचित शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है, बल्कि क्रांतिकारी सामाजिक प्रक्रिया को भी गलत ढंग से लिया जा रहा है। समाज को ज्यादा से ज्यादा एक प्रभावकारी तत्व के रूप में, वातावरण के रूप में लिया जा सकता है। इसके साथ यह भी मानना पड़ेगा कि कोई व्यक्ति इस प्रभाव को किस सीमा तक अपने में आने देगा, अपने को प्रभावित होने देगा यह व्यक्ति पर ही निर्भर करेगा। यदि ऐसा न होता तो सरदार भगत सिंह जैसे व्यक्ति समाज में कैसे अस्तित्व में आते? समाज को नीचे बहकर आती हुई नदी के रूप में देखा जाये तो हम मानेंगे कि मछलियाँ उसके बहाव के साथ नीचे की ओर आयेंगी। लेकिन सालोमन जैसी मछलियाँ भी होंगी जो धारा के विरुद्ध तैरेंगी और ऊँचे से ऊँचे स्थानों पर अपने अंडे देंगी! यदि नीचे बहकर आना प्रकृति है तो ऊर्ध्व गमन करना भी प्रकृति ही है, न कि कुछ और! हमें यह देखना है कि हम प्रकृति को किस तरह से लेते हैं। इसीलिए मुझे लगता है कि प्रकृति को समझनेवाला व्यक्ति में निहित है, प्रकृति स्वयं को समझाती हुई हममें प्रवेश नहीं करती। हमारी दृष्टि ही उसे समझती है, चाहे सही, चाहे गलत। समाज के साथ भी यही है।

हमारी किसी भी समझ के लिए प्रकृति को कोई दोष नहीं लगता। हमें सर्दी लग रही है, ठिठुर रहे हैं, इसके लिए प्रकृति दोषी नहीं है। इसी तरह हम गर्मी में झुलस रहे हैं, जल रहे हैं, प्रकृति निर्दोष है। हम वसंत में आनंद मना रहे हैं, यह हमारी अपनी बात है। मौसम कोई भी हो, कुआं खोदनेवाला कुआं खोद रहा है, मुनीम हिसाब कर रहा है, खिलाड़ी अपनी वर्ज़िश कर रहा है, विद्यार्थी पढ़ रहा है। जब वे अपने काम से फुर्सत पाते हैं तब मौसम पर ध्यान देते हैं। हाँ, यदि प्रकृति शरीर के रहने की स्थितियों को ही बदल दे, जीवन ही असंभव हो जाये, तब की बात अलग है। लेकिन वह स्थिति हमेशा की स्थिति नहीं है और उस समय जीवन का महत्व भी अभी की भांति नहीं है। टाइटैनिक में अच्छे लोग सवार थे या बुरे, बच्चे सवार थे या युवा या बूढ़े, इसका कोई महत्व नहीं रह जाता। उस स्थिति में जीवन का प्रतिमान ही बदल गया। अत: कायदे से देखा जाये तो वहाँ भी प्रकृति को कोई दोष नहीं लगता। अत: कहने का तात्पर्य यह है कि प्रकृति और हम यानी जीव, मानो दो गोलार्द्ध हैं। दोनों के मेल से जीवन बना है। केवल हम हों इससे जीवन की शर्त पूरी नहीं होती, इसमें संदेह है कि ऐसा हो भी सकता है या नहीं। दूसरी ओर, केवल प्रकृति हो, उसे देखने-ग्रहण करनेवाला व्यक्ति न हो, तो प्रकृति का भी अर्थ नहीं के बराबर हुआ। अत: जीव और प्रकृति के मेल को जीवन कहना चाहिए। मृत्यु यानी जीव और प्रकृति का विच्छेद -– उस प्रकृति का विच्छेद जो सहज ही हमारे जानने पहचानने में आती है।

प्रकृति अपनी राह चलती है, हम भी अपनी राह चलते हैं। हम प्रकृति में समा नहीं सकते, प्रकृति भी हममें समा नहीं सकती। हम प्रकृति को पूर्णरूपेण आवृत्त नहीं कर सकते, प्रकृति भी हमें पूर्णरूपेण आवृत्त नहीं कर सकती। प्रकृति हमारे चारों ओर है, सब ओर से व्याप्त है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है, अथवा यह अनिवार्य नहीं है कि हम अपने को प्रकृति से सराबोर कर लें। हम सटीक तरह से ऐसा कर भी नहीं सकते। हम कितना भी प्रकृतिवादी हो जायें, हममें अपना कुछ स्वत्व रहेगा ही। हम गर्मियों में गर्मी मनायेंगे, सर्दियों में सर्दी। प्रकृति परिवर्तनशील है, हमें भी परिवर्तनशील होना चाहिए – यही शोभनीय है। जड़ता न हमारे लिए ठीक है, न प्रकृति के लिए। हमें प्रकृति के उस रूप का प्रेक्षण करना चाहिए जो उसका वर्तमान रूप है। लेकिन यह साधारण जीवन की बात है। इन रूपों को दरकिनार करके हम प्रकृति के गहरे स्वरूपों में भी उतर सकते हैं, लेकिन इसके लिए हमें प्रकृति के सहज ग्राह्य रूप को परे करना होगा – तभी हम ऐसा कर सकेंगे। जो प्रकृति और उसके उपादान साधारण रूप से हमें उपलब्ध होते हैं, उतने में ही प्रकृति सीमित नहीं है, दूरबीन से, सूक्ष्मदर्शी से देखने पर दूसरे क्षेत्र भी प्रत्यक्ष होंगे, लेकिन उसके लिए साधारण परिदृश्य को छोड़ देना पड़ेगा। हम प्रकृति के किस और कितने सूक्ष्म अंश पर सक्रिय होंगे -– यह व्यक्ति के रूप में हम पर निर्भर करेगा। हमारे लिए यह बिलकुल भी जरूरी नहीं कि जो आसानी से, सहजता से दिख रहा है उतना ही देखें, क्योंकि यही हमारी रचनात्मकता या जीवन की सीमा नहीं है। इस सीमा का अतिक्रमण किया जा सकता है। किस सीमा तक अतिक्रमण किया जा सकता है? यह तय नहीं है... कहना चाहिए आकाश ही सीमा है, और यह सौभाग्य की बात है। केवल अभ्यास की बात है। मानव जाति ने यह अतिक्रमण अनगिनत बार किया है, और हम सभी यह अच्छी तरह जानते हैं। प्रकृति कहीं भी हमें रोकती नहीं है, हमें रुकना भी नहीं चाहिए। हाँ, किसी राह पर चलने की जो शर्तें हैं, उन्हें समझते हुए चलना होगा। आणविक शक्ति का अनुसंधान करते करते वैज्ञानिकों को एक दिन सफलता मिल ही गयी, हाँ, पदार्थ की शर्तों का पालन जरूर करना पड़ा। 
(क्रमश: अगले ब्लॉग में जारी...)

- अमरदीप कुलश्रेष्ठ


मुख्य प्रबंधक ,राज भाषा, युको बैंक, जोरहाट, आसाम


amardeepkulshresth@gmail.com


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