Wednesday, 9 January 2019

कहाँ बसती है साहित्यकार की आत्मा

सवाल जितना पुराना है, उतना ही विवादास्पद भी। जब से लिखना शुरू किया था और जब से लिखनेवालों के बारे में दार्शनिक मान्यताओं से वास्ता पड़ने लग गया था, तब से यह एक सवाल बार-बार मन में आता था- साहित्यकार की आत्मा कहाँ बसती है? यह बात एक तरह की गांधीगीरी से निकली थी, गांधीजी ने कहा जो है कि भारत गांवों में बसता है। हम तो ठहरे फितूरमिज़ाज, खुद पर ही सवाल दाग दिया – एक लेखक या साहित्यकार कहाँ बसता है, उसकी आत्मा कहाँ बसती है!

जिस सवाल पर हम अक्सर निर्णय पर पहुँच नहीं पाते या किसी उपलब्धि के शिकार नहीं हो पाते, उस सवाल पर जानलेवा हमला कर बैठते हैं, उसे ज़मींदोज़ करना हमारा कांटे का सपना बन जाता है। लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ भी करना टेढ़ी खीर है। आत्मा तो अजर अमर अविनाशी है, उस पर जानलेवा हमला करना या उसे ज़मींदोज़ करना तो बड़ा हास्यास्पद हो जायेगा। चाहता तो मैं भी किसी कट्टर वस्तुवादी की तरह आत्मा के अस्तित्व को बिलकुल सफाचट करते हुए इस सवाल को – कि साहित्यकार की आत्मा कहाँ बसती है- एकदम खारिज कर सकता था। पर कठिनाई यह है कि दार्शनिक मान्यताओं के मामले में मेरे मन में अपनी नादानी के दिनों से ही बड़ी श्रद्धा है, उनके मामले में मैं अपनी कुल जमा पूँजी दांव पर लगाकर ही हरकत में आता हूँ। दार्शनिक अर्थ वाली आत्मा भले न होती हो लेकिन साहित्यिक मामलों में आत्मा का एक पूर्णत: लौकिक अर्थ भी है, और उस अर्थ में इस सवाल को रखने से भी सवाल के वजन में कोई घटाव नहीं दिखता।

आखिर कहाँ बसती है साहित्यकार की आत्मा! सवाल इसलिए भी जटिल है कि साहित्यकारों की बहुत-सी श्रेणियाँ दिखाई देती हैं। दूसरे, बिलकुल विशुद्ध साहित्यकार – तुलसी, रहीम, मीरा वाली श्रेणी के – आजकल दिखाई नहीं देते। इसलिए पहले साहित्यकार का अर्थ निश्चय करना पड़ेगा, प्रश्न के एक धड़े को पकड़ लेना पड़ेगा।

साहित्यकारों का श्रेणीकरण कैसे किया जाए। इस विषय में मुझ नादान ने देशों के श्रेणीकरण का फार्मूला तय किया था। वो मेरी जवानी के दिन थे और मुझे लगा था कि आदमी और देश लगभग एक जैसे होते हैं... बहरहाल, आप थोड़ा हंस लीजिए और मेरी इस मान्यता को सुनिए – मैंने देशों की तर्ज़ पर साहित्यकारों के तीन-चार वर्ग किए – विकसित, अर्ध-विकसित या विकासशील, और पिछड़े हुए साहित्यकार। शुरू-शुरू में किसी सवाल को देखकर घबड़ाहट होती है, पर सही युक्ति काम में ले ली जाए तो सब कुछ बिलकुल साफ हो जाता है। एक उपन्यास में पढ़ा था कि महारथी कर्ण ने एक कंटीली भूमि के टुकड़े को अपनी विशाल सेना सहित पार करने के लिए एक युक्ति निकाली। बड़ी संख्या में युद्ध में काम आने वाले हाथियों को मदिरा पिलाकर मदमस्त कर दिया गया और युद्ध का कोलाहल संगीत मचाकर हाथियों को कंटीले जंगल की ओर खड़ा कर दिया गया। हाथीगण स्वयं घायल और चोटिल अवश्य हुए, लेकिन उन्होंने कंटीला जंगल पार करके ही दम लिया या मार्ग में ही ढेर हो गए। जाहिर है उस समय पशु अधिकार जैसी कोई अवधारणा नहीं थी।... मैंने भी देशों के साथ आदमियों की तुलना की और उससे साहित्यकारों के वर्गीकरण का कंटकाकीर्ण मार्ग स्वच्छ कर लिया, इसमें कितनी संख्या में मदमस्त हाथी घायल आदि-इत्यादि हुए, कितनी गहराई तक चिरे, यह एक अलहदा विषय है।

तो मेरे आँखिन देखे साहित्यकारों की तीन श्रेणियाँ हैं – विकसित, विकासशील और पिछड़े। यह सब केवल साहित्यिकता के आधार पर नहीं है। साहित्य का तो केवल टोकन भर है, असल बात तो सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, समूह-मनोविज्ञानपरक (जिसे सरल शब्दों में भीड़ तंत्र भी कहते हैं और जो वास्तव में कोई तंत्र नहीं वरन तंत्रहीनता का ही एक ससम्मान नामकरण है) आदि के पक्षों-प्रतिपक्षों पर टिकी हुई है। सब मिलाकर स्थिति एक तरह के बाजार तंत्र जैसी है। और यह बाजार निर्गुणवादी कवि कबीर वाला बाजार नहीं है। इस बाजार में समता को छोड़कर सब कुछ है। चंचलता के मामले में पारंपरिक रूप से महालक्ष्मी को सर्वाधिकार मिला हुआ था। लेकिन आज की स्थिति में साहित्यकारों और उनकी कारगुजारियों की मान्यता का मसला चंचलता में और आगे ही बैठेगा। लक्ष्मीजी को किसी का भाग्य पलटने में एक अरसा लगता था, लेकिन साहित्यकार की मान्यता के स्थापित या विस्थापित होने में आजकल उतना समय पर्याप्त है जिसमें सेंसेक्स उठता है और गिर जाता है। एक सभा अपने समवेत कृत्य, या सभा जितना ही वजन रखनेवाला कोई सभापति अपने एक दृष्टि-क्षेप से क्या कर सकता है, यह मेरे कहने-सुनने पर आश्रित नहीं है, सुधीजन जानते ही हैं।

मुझे लगता है, साहित्यकारों की अद्यतन स्थिति के विषय में इतना विवरण काफी होना चाहिए। यदि नहीं तो कोई बात नहीं, अपने स्वयं के साहित्यकार होने में विश्वास रखनेवाले आदमी मुझ विकासशील साहित्यकार से उसके घर के पते पर संपर्क कर सकते हैं।... अब बात आती है साहित्यकार की आत्मा की! मैं उस श्रेणी के साहित्यकार के विचार-सागर से समृद्ध हुआ हूँ, उसका ऋणी हूँ जिसमें संकोच एक श्रेष्ठ गुण होता है जो और गुणों को, साहित्यिक गुणों को खींचकर लाता है। आजकल इस गुण की क्या स्थिति है, इसका अंतिम रूप से निर्णय करने में मुझे अभी कुछ और समय लगेगा। लेकिन यह मेरा विषय नहीं है। मेरा कथ्य यह है कि आत्मा पर बात करने में संस्कारवश अपने को बड़ा सलज्ज अनुभव करता हूँ, वैसे ही जैसे किसी नयी नयी दुल्हन के साथ होता है। आत्मा की बात करते ही जैसे सब कुछ गुम्म हो जाता है!

मैंने पढ़ा है कि एक समय था जब मानव को ही सारे प्राकृतिक क्रमविकास का केन्द्र माना गया था, नामकरण ही हुआ था – मानववाद। इस वाद का बड़ी शिद्दत से स्वागत हुआ था और उस समय के लोग बड़ी गर्मजोशी के साथ इसके गुणानुवाद और कर्मानुवाद में लग गये थे। लेकिन इतिहास बताता है कि मानववाद हमेशा अजेय नहीं रहा। वह लड़खड़ा गया और दूसरे वाद – यथार्थवाद, प्रकृतिवाद, अस्तित्ववाद आदि उस पर पैर रखते हुए बढ़ गये! लेकिन मेरा सवाल यह है कि क्या आत्मवाद के बारे में भी ऐसा कहा जा सकता है? पहली बात तो ऐसा वाद अब तक आया नहीं, लेकिन मेरा कहना यह है कि आत्मा लौकिक अर्थ में भी, सार-तत्व के अर्थ में, किसी वस्तु के कुल-के-कुल प्रयोजनीय अर्थ में भी पूरी तरह व्यावहारिक बैठती है। मानववाद का मुंह की खाना मानव के प्रयोजनीय सार-तत्व के रूप में आत्मा की प्रासंगिकता को कुंद नहीं करता बल्कि इस संभावना की ओर इंगित करता है कि मानव के वर्तमान प्रयत्न पूरे नहीं पड़े हैं और उसके जीवन की व्यक्तिगत और सामूहिक सार्थकता के लिए अभी काफी कुछ सोचा जाना और किया जाना शेष है...

मतलब यह कि मानव की वर्तमान समझ को पर्याप्त मान लेना ठीक नहीं है। कुछ और चीज़ों का संपादित होना रह गया है। वर्तमान मानव से सहित्यकार मानव की दूरी इन्हीं चीज़ों के संपादित होने या न हो पाने के बीच में छिपी हुई है। कहने की बात ही नहीं है कि मैं साहित्यकार को वर्तमान मानव के उन्नत संस्करण के रूप में देख रहा हूँ। वह मानव को उसके भविष्य से जोड़नेवाली, या भविष्य, या कम से कम उसका सपना दिखानेवाली कड़ी है। उसी अर्थ में जिसमें तुलसी और कबीर अपने युग के लिए थे... जब एक साहित्यकार यह समझता है कि यह समय, यह वर्तमान उसे समझ नहीं रहा है, तब वह उस भविष्य पर खड़ा होता है जिसे वह वर्तमान तक खींचकर लाने के लिए अपने को निवेश किए दे रहा है।... वर्तमान का अच्छा मानव देशगत और विश्वगत मानसिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ रहा है, हो सकता है भविष्य का साहित्यकार शिष्टाचार के नये प्रतिमान का फरमान जारी करने की तैयारी में हो!

सहित्यकार की आत्मा मानवता के भविष्य को देख सकने की साहित्यकार की भेदिनी दृष्टि में बसती है। जहाँ वह दृष्टि विश्राम करती है, वहीं बसती है साहित्यकार की आत्मा!            

-अमदीप कुलश्रेष्ठ,
मुख्य प्रबंधक (राजभाषा), 
यूको बैंक, अंचल कार्यालय जोरहाट
amardeepkulshresth@gmail.com     

0 comments:

Post a Comment

क्या हम सही दिशा में सोच रहे हैं?

चिंतन का विषय - शुरू शुरू में जब समझदारी एक नयी-नयी चीज़ की तरह दिखायी देती थी, तब मैंने जीवन का एक कामचलाऊ प्रारूप बना लिया था, जो जीवन ...