एक बार हम लोग आपसे
पत्रिका के लिए समय मांगने आये थे। आप में से बहुतों ने समय दिया था और दे रहे हैं, बल्कि हम आपके दिए समय के
अनुसार सभी को मुद्रित पत्रिका भी नहीं दे पा रहे हैं, बस ई-बुक के रूप में
वेबसाइट, ई-मेल या अन्य
इलेक्ट्रोनिक माध्यम से भेज रहे हैं । आप समझ ही रहे हैं कि अर्थ की आवश्यकता होती
है मुद्रण के माध्यम से पत्रिका निकालने में । इसलिए इस बार हम लोग आपसे वित्तीय
सहायता की आशा के साथ सम्मुख आए हैं ।
हम यह समझते हैं कि आज के
जमाने में अर्थ मांगना सबसे बड़ा अनर्थ है। क्योंकि यही तो एक सर्वप्रिय वस्तु है
आज के समाज में । और किसी का भी प्रिय वस्तु मांग लेना अनर्थ ही तो है । आज समाज
इसी अर्थ के पीछे भाग रहा है , इसकी मृगतृष्णा बराबर बनी हुई है। अर्थ प्राप्ति के लिए कई अनर्थों
को न्योता दिया जाता रहा है और उनका जोखिम सिर पर उठाया जा रहा है। हमने सोचा, हम भी अर्थ निवेदन का छोटा
सा अनर्थ करके देखें।
बात बिलकुल सीधी है - हमें
केवल पत्रिका चलाने के लिए वित्तीय सहयोग की आप सभी सुधी सजग पाठकों से अपेक्षा
है। मिलने को तो कुछ संस्थाओं को इतना मिलता है (सरकारी-बेसरकारी माध्यम से) कि वे
उचित समय पर खर्च भी नहीं कर पाती हैं और मिला हुआ वापस भी चला जाता है । आखिर पद
प्रतिष्ठा बड़ी चीज़ है! लघु-पत्रिकाओं के लिए तो वह सब एक जन्नती दरवाजा है जो
उनके लिए शायद कभी खुलनेवाला नहीं है। भले ही उनमें साहित्य के प्रसार-प्रचार में अपनी सामर्थ्य से बहुत
ज्यादा पाँव पसारने का जज्बा हो। इसलिए लौट फेरकर हमें अपने आप और आप पाठकों पर ही
आकर खड़ा होना पड़ता है ।
मगर अर्थ मिलता कहाँ है!
कोई कैसे किसी को मांगने भर से ही अपनी प्रिय वस्तु दे दे ! ना तो हम मांगने वाले
विश्वामित्र हैं और न देने वाले महाराज दशरथ, कि हमारे एक आव्हान पर अपने अर्थ पुत्रों को समाज के जंगल में हमारे
साथ भेज दें। हमें यह भी ध्यान रहता है कि
"आब गई, आदर गया, नैनन गया स्नेह,
यह तीनों तब ही गए, जबकि कहा कछु देह ।"
मगर जरा सोचिए, आज के जमाने में आप हर
वाजिब-गैर-वाजिब बात पर मुद्रा खर्चने लिए तैयार रहते हैं, तो किताबों और पत्रिकाओं
के लिए थोड़ा-सा अर्थ खर्च करने को तैयार रहने में क्या हर्ज है? महंगाई तो बेशक है, मगर सोचिए, कहाँ-कहाँ आपसे बात-बेबात
आपका अर्थ छीना जाता है, या यूँ कहिए कि ऐंठ लिया जाता है । स्वास्थ्य के नाम पर...शिक्षा के
नाम पर...न्याय के नाम पर..... आदि आदि। हमारा सुझाव यह है कि आप अपने हर महीने के
बजट में पुस्तकों-पत्रिकाओं को भी शामिल करने पर विचार करें, जो कि आपके खुद के
विवेकपूर्ण निर्णय से हो, किसी मजबूरी से नहीं, किसी फरमान के चलते नहीं। यह आपका आत्मनिर्णय हो। 500 रुपये या फिर 100 रुपये ही अलग से पुस्तकों
और पत्रिकाओं के लिए रखना क्या आपके लिए कठिन है ? 500 रुपये हर महीने रखने से तो कुछ ही सालों में आपका घर एक छोटा-सा
पुस्तकालय बन जाएगा । 6000 रुपये की पुस्तकें आप हर साल खरीद सकते हैं । अगर आप
केवल 100 रुपये रखते हैं तो केवल 1200 रुपये में आप प्रत्येक वर्ष 100 रुपये के छह संग्रह और
50 रुपये की 12 पत्रिकाएं खरीद सकते हैं । यकीन मानिए यह खर्च आपके घर परिवार को
बहुत कुछ दे जाएगा और जो आपकी अगली पीढ़ी तक भी बरकरार रहेगा।
हम में से बहुत लोग ऐसा
करते भी हैं , परंतु हमें यह भी मालूम है
कि अधिकतर लोग पुस्तकों के लिए पैसे अलग से रखना सोच भी नहीं सकते । अगर ऐसा न
होता तो 80 बरस की आयु में पैर रखते वयोवृद्ध किसी वरिष्ठ रचनाकार को अपनी पेंशन
के पैसों से पुस्तकें निकालकर मुफ्त में बांटने की जरूरत नहीं पड़ती । या फिर 28
साल की लगन से 600 पेज के किसी महाकाव्य के प्रकाशित होते ही आधी से अधिक प्रतियाँ
30 दिन में ही बिक जानी चाहिए थीं । अगर पुस्तकें घर में आ जाएँगी तो कभी न कभी
उन्हें पढ़ा अवश्य जाएगा । धरती कभी वीरों से खाली नहीं होती।
ऐसे व्यक्ति जरूर हैं जो
सभी जिम्मेदारियों के होते होते-सोते अपना घर जरूरतमंदों के लिए पुस्तकालय-सा
बनाते रहते हैं। परंतु हम केवल ऐसे व्यक्ति का नाम सुनकर वाहवाही करके रह जाते हैं
। आप ऐसे कई अच्छे-खासे पढ़े लिखे व्यक्तियों को जानते होंगे जो केवल
पाठ्यक्रम या व्यवसायपरक पुस्तकों के अलावा अन्य किसी पुस्तक को हाथ नहीं लगाना
चाहते । सबसे चिंताजनक है पढ़ने के संस्कार का गायब हो जाना। ऐसे कितने ही व्यक्ति
हैं जो जो अपने अध्ययन काल में साहित्य पढ़ने के आदी थे और पारिवारिक
जिम्मेदारियों के बढ़ने तक साहित्य मर्मज्ञ भी बने परंतु कई कारणों से अपने बच्चों
में पढ़ने की वह परिपाटी स्थापित नहीं कर सके। साहित्य की सोच समझ का विकास न होना
स्वस्थ बुद्धि के ह्रास का ही पर्याय है। अपने समय और परिवेश के लिए आपको साहित्य
जैसा मार्गदर्शक दर्पण नहीं मिल सकता। साहित्य का सान्निध्य खोना जीवन संजीवनी का
खो देना है। आज के चौतरफा तनाव के दौर में अपने आप को साहित्य के प्रकाश से
प्रकाशित रखना बहुत आवश्यक है। विकल्पहीन होकर किसी व्यावसायिक डाक्टर या मनोचिकित्सक की
फीस देने से कहीं अच्छा है की साहित्य रूपी चिंतामणि में धैर्य पूर्वक निवेश किया
जाता रहे।
ऐसा करें तो हिंदी के
पुस्तकों की खपत का रोना भी धीरे-धीरे बंद हो जाएगा । और अगर ये बचकानी बातें धीरे
धीरे नवयुवकों के हृदय में समा गईं तो वे वैलेनटाइन डे पर भी पुस्तकें ही उपहार
में भेंट करने लगेंगे। आये दिन प्रकाशक अच्छे-अच्छे लेखकों को उनका वित्तीय भाग
देने से इन्कार कर यह कहते नहीं फिरेंगे कि पुस्तकें बिकती ही नहीं तो हम क्यों
छापें रचनाकारों को। मगर इस समस्या का समाधान तभी संभव है जब हमारी आँखें खुल जाएँ
।
हमारी मानसिकता लिए यह है
कि अपने मित्र की किताब पैसे देकर क्यों पढ़ूँ, उसे तो मुझे ऐसे ही दे देना चाहिए। हाँ! जरूर देना चाहिए अगर किताबें
ऐसे ही छप जाया करतीं। होता यह है कि वह आपको अपनी किताबें मुफ्त में दे ही देता है, संकोचवश, क्योंकि आपको जितना ख्याल
पुस्तक लेने का रहता है, उससे कहीं अधिक ख्याल रहता है उसे आपको पुस्तक देने का। आपके लेखक
मित्र ने तो अपना कर्तव्य निभाया, मगर क्या हमारा-आपका कर्तव्य नहीं बनता कि उसके पॉकेट में हठपूर्वक
सहयोग राशि रख दी जाए । आखिर समाज के लिए उसने जो सदुद्योग किया उसके लिए समाज
आखिर क्या कर सकता है! इस विषय पर सोचना बहुत आवश्यक है। कष्टसाध्य मनोमंथन से
उत्सर्जित उत्कृष्ट चिंतन का अवदान लेने की प्रक्रिया में समाज की ओर से प्रतिदान
देने का जिम्मा आखिर कोई तो लेगा? हमने तो अपना संकोच तोड़ना ही अपना कर्तव्य मान लिया है कि थोड़ा एहसास
करवाया जाए। आपके द्वारा न देने और
लेखकों द्वारा न लेने के संकोच को तोड़ा जाए ।
आप कहेंगे कि इससे ऐसी
पुस्तकों की भरमार हो जाएगी जिनकी गुणवत्ता कम होगी, तो इसका दायित्व भी तो आप पर है कि आप उनकी पुस्तकें पढ़ें और उन्हें
जानकारी दें कि क्या कमी रह गई है। इससे रचनाकार अपनी गुणवत्ता सुधारने का प्रयत्न
अवश्य करेगा। वैसे भी ज्ञान अपना परिष्कार स्वयं करता है बशर्ते उसके लिए वैसी
स्थितियां मौजूद हों। जैसे नदी अपने आप को साफ कर लेती है जब तक कि प्रदूषण एक
सीमा से अधिक न हो जाए। और फिर रचनाकार भी एक दूसरे का संबल बन ही जाएंगे। सौ की
एक बात यह कि जब तक पुस्तकें हर तरह की मजबूरी से ऊपर उठकर और निर्द्वंद्व भाव से
खरीदकर नहीं पढ़ी जाएँगी उनका महत्व पकड़ में नहीं आएगा ।
धर्मो रक्षति रक्षित: की तर्ज पर
हमें यह कहने के लिए स्वतंत्र कर दीजिए कि पुस्तकों की रक्षा कीजिए ताकि पुस्तकें समाज की
रक्षा कर सकें।
संपादक मंडल
मरुतृण साहित्य-पत्रिका






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