Tuesday, 8 January 2019

साहित्यकार की सच्चाई मुख्य धारा में कब तक आएगी ?


उपेक्षित प्रश्नों की महासभा

हम साहित्य को जीवन से क्यों नहीं जोड़ पा रहे हैं ? साहित्य क्यों नहीं मार्गदर्शक का काम कर पा रहा है? समाज की जब इतनी सारी समस्याएँ हैं तो उसे हल करने की दिशा में साहित्य क्यों नहीं बढ़ पा रहा है ? क्यों साहित्य के बोझ तले रचित रचनाएँ केवल शोध का विषय बन-बनकर बड़े-बड़े पुस्तकालयों की शोभा बढ़ा रही हैं? क्यों कुछ साहित्यकार यथार्थ का हूबहू चित्रण करने में अपनी कला को समर्पित करने के लिए यह तर्क देते देखे जा रहे हैं कि साहित्यकार कोई समाज सुधारक तो है नहीं कि समाज को सीख देता चले ? अगर यथार्थ के चित्रण को साहित्यकार अपने कर्तव्य की इतिश्री करने का साधन बना लेता है तो क्या यह प्रश्न नहीं उठता कि आम पाठक ऐसा साहित्य क्यों पढ़ें ? यदि साहित्य उसके जीवन की विसंगतियों को सुलझाने का संकेत तक न दे सके तो भला क्यों पढ़ें ऐसे साहित्य ?
ठीक इसके विपरीत भी कहा जा सकता है कि अगर साहित्य में ऐसी प्रभाविता आ जाए कि वह किसी के जीवन की जटिल से जटिल समस्या को सुलझा दे तो कोई ऐसे साहित्य को क्यों नहीं पढ़ेगा ? क्यों वह अंधविश्वास की अंधी गलियों में अपनी उम्मीदों की पोटली लिये अपना सब कुछ लुटा-पिटाकर घूमता फिरेगा? मानसिक गुलाम बनाते पूंजीपति वर्ग के चंगुल में आसानी से फँसने के बजाए कोई साहित्य अगर उससे निकलने का शर्तिया मार्ग दिखाए, दावे के साथ उसकी चुनौतियों का खुलासा करे और उससे निर्णयक लड़ाई की तरकीबें सुझाए, तो क्यों नहीं कोई ऐसा साहित्य पढ़ेगा ? वह समय कब आएगा जब कि साहित्य सीधे मानसिक दासता की बेड़ियों पर चोट करे; उसमें इतनी ताकत हो कि वह उन्हें छिन्न-भिन्न कर दे और मानव को सस्ते बाजारवाद की अक्टोपसी पकड़ से निज़ात दिलाने के लिए उसका मानसिक प्रशिक्षण प्रारंभ करे? मन की जटिलता में वैचारिक प्रदूषण पाल रहे बुद्धिजीवियों को स्वच्छ विचार प्रदान करे; क्या ऐसे साहित्य का सृजन करना संभव नहीं हैं? क्या साहित्य में ऐसी शक्ति लाना संभव नहीं है जिससे कि मानव शरीरधारी कोई  व्यक्ति सड़क के किनारे पड़े भिक्षुक से भिक्षा का पात्र छुड़वाकर उसे कर्म करने पर मजबूर कर दे ? क्या ऐसे साहित्य का
सृजन संभव नहीं है जो नवयुवकों में ऐसी उमंग भर दे कि वे अपनी ऊर्जा को परस्पर संगठित कर कोई ऐसा व्यूह रचने पर अपने को मजबूर पाएँ जो लाखों करोड़ों लोगों की दो वक्त की भौतिक क्षुधा तो शांत करे ही, उनकी आंतरिक ऊर्जा के बाहर आने का रास्ता भी खोले जिससे उनकी सारी नकारात्मक शक्तियाँ उनके आगे नतमस्तक हो जाएँ ?
क्या ऐसा संभव नहीं है कि एक साहित्यकार अपनी अक्षय स्वत:स्फूर्त क्षमता को पहचानकर साधनापूर्वक उसे धारण करे और जो उसे वह ओजस्वी शक्ति प्रदान करे जो वास्तव में एक साहित्यकार के पास होनी चाहिए ?
इसके लिए क्या सबसे पहले उसे अपने साहित्यकार होने के अहं को नहीं त्यागना होगा ? क्या एक कवि या कथाकार रूप में जाने जाने से पहले उसे यह अच्छी तरह ठोक-बजाकर आत्मसात नहीं कर लेना चाहिए कि कवि या कथाकार होना वास्तव में क्या है ? जिस तरह हमारी महिलाएँ मिट्टी के घड़े को बजाकर देखती हैं कि वह कच्चा तो नहीं है, उसी तरह साहित्यकार को अपनी आत्म-परीक्षा नहीं करनी चाहिए? कविता या कहानी (या साहित्य की कोई भी विधा) की मौलिकता क्या है? अब तक क्या-क्या कहा जा चुका है साहित्य में ? और इस समय क्या बचा रह गया है साहित्य में कहने के लिए ? जो पहले कहा जा चुका है उसे फिर से लिखकर दोहराने से क्या लाभ? अगर सचमुच आवश्यकता हो तो क्या उस कहे हुए को पहले के ही नाम से पुन: प्रचारित करना अनिवार्य नहीं है, बजाए इसके कि उन्हीं बातों को नाम मात्र की आभासी नवीनता देकर दोहरा दिया जाए? क्या इस सबके लिए साहित्य के सतत अभ्यास और सत्यनिष्ठा की आवश्यकता नहीं है ? क्या इसकी आवश्यकता नहीं है कि रचनाकार स्वयं अपने जीवन को ही साहित्य में पहले उतार दे और फिर साहित्य रचना करे ? जो करे वही साहित्य में क्यों न उतारे, जो साहित्य रचे उसे ही जीवन में क्यों न उतारे? क्या इस प्रक्रिया से वर्तमान रचनाकार स्वयं लाभान्वित नहीं होंगे ? केवल कविता लिखने के लिए कविता लिखना, केवल कवि बन जाने के लिए कविता लिखना, केवल मंचों पर कविता सुनाने के लिए कविता लिखना, कितना तर्कसंगत है ? क्या यही है एक साहित्यकार की सच्चाई ? क्या यही हैं साहित्य की मुख्य धारा की गतिविधियाँ ? अगर नहीं, तो किस बात का इंतजार है साहित्यकारों को? साहित्य सरिता की धारा को गलत दिशा में मुड़ने से रोक लेने में? सामने कुछ और मन में कुछ और लेकर कब तक हम पाठक को भरमाते रहेंगे और यह समझते रहेंगे कि हमारी इस करतूत को पाठक समझ नहीं रहा है ? हम जो लिख कर दे दे रहे हैं वही पाठक बिना साहित्यकार पर अंगुली उठाए, मान जाएगा - ऐसा भ्रम हमने क्यों पाल रखा है ?
ऐसा करके हम किसे भरमा रहे होते हैं - पाठक को या स्वयं को ? पाठक वर्ग को क्या सब मालूम नहीं है? वह हमारी पीठ पीछे ऐसे साहित्यकारों पर अंगुलियाँ उठा रहे हैं तो इसमें दोष किसका ?
आज हमारे पास सोशल मीडिया जैसा सशक्त हथियार आसानी से हाथ लग गया है, तो क्या हम इसका प्रयोग केवल अपनी निजी तात्कालिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने तक ही सीमित करके रख लेंगे? और भूखे-नंगों के फोटो लेकर पोस्ट करते रहेंगे? केवल लाइक और कमेंट से खुश हो लेंगे? रास्ते में किसी फटेहाल भिखारिन को बच्चों को दूध पिलाते देखा और फिर उसका तस्वीर ले ली और कविता लिख डाली और दे दिए दोनों फेसबुक पर; क्या यह संवेदनाओं को चुराकर अपनी स्वार्थ सिद्धि नहीं हुई? संवेदना चुरा लेने और स्वच्छ रूप से ले लेने में क्या अंतर नहीं है ? अगर वह साहित्य वास्तव में उस गरीब के लिए कुछ भी करनेवाला है तो अवश्य ही वह संवेदना ग्रहण करने का विषय होगा अन्यथा उसे चुराना कहने में क्या हर्ज है ? अगर हमारे पास एक सही और समाज-उपयोगी बात को पल में लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंचा देने की ताकत है, तो उस बात का लाखों करोड़ों लोगों तक पहुँचने लायक सबल होना भी क्या अनिवार्य नहीं है? और क्या सबल रचना के लिए रचनाकार को भी उतना ही सबल होना आवश्यक नहीं है? उसके लिए क्या सबसे पहले यह जरूरी नहीं है कि वह अपनी बातों को फटाफट अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने की लालसा त्यागे और अपनी पूरी ईमानदार शक्ति से ऐसी बातें लोगों में पहुँचाने की तैयारी करे जो कम भले हों पर टिकाऊ हों? क्या एक सशक्त विचार हजारों कमजोर विचारों पर भारी नहीं पड़ेगा?   
प्रश्न यह उठता है कि साहित्यकार बनने से पहले हमें अपने अन्दर के अहं से साक्षात्कार कैसे करना चाहिए? क्योंकि बिना इस द्वारपालसे मिले हम अपने अन्दर बैठे उस विशुद्ध साहित्यकार का साक्षात्कार कैसे कर सकते हैं ? हम जो इस अहं का अपनी अनुशंसा की लालायित तिकड़मबाजी से बेजा पोषण कर रहे हैं, और उससे क्या हो रहा है, इसका हमें कितना अनुमान है ? और जब तक यह अहं हमारे अन्दर के विशुद्ध साहित्यकार के द्वारे खड़ा रहेगा तब तक हम कैसे समाज को प्रभावित करने वाला साहित्य दे सकते हैं, क्योंकि ऐसा साहित्य भी दूसरों के द्वारे खड़े द्वारपाल से जाकर उलझ जाएगा, उसके भीतर अवस्थित निर्मल हृदय तक उसकी पहुँच नहीं बनेगी ? क्या हमें इस महत् कार्य के लिए सच्चे साधक साहित्यकारों के शरणापन्न नहीं होना चाहिए, जिन्होंने अपने जीवन का सर्वस्व लुटाकर भी साहित्य को दमदार बनाया ?
हर कार्य में एक नैसर्गिक सामंजस्य हमें कब दिखाई देगा? कुछ ऐसा करने की जरूरत क्यों नहीं महसूस होती जिसमें हर वर्ग के लोगों को शामिल किया जा सके? बल्कि वर्ग ही न रहे? क्या ऐसा करने के लिए हम किसी विशाल आधार या संसाधनों की तलाश में अपनी जीवन की निधि गँवाते चले जाएँगे?
अगर "वार बिगिन्स इन द माइंड ऑफ द पीपल" हो सकता है तो समाज में बड़े बदलाव का खाका खींचने का काम करने के बजाए साहित्य अपने आप को संकुचित करता हुआ क्यों चल रहा है ? अनोखे समाज के सृजन के लिए आधारभूत साहित्य और संस्कृति का सहारा क्यों नहीं टटोला जा रहा है? ऐसी सोच हमारे मस्तिष्क में क्यों नहीं उत्पन्न हो रही है ? अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो आज एक सजग कहा जानेवाला बुद्धिजीवी सभी राजनेताओं के नाम और कारनामे भले ही जानता है परंतु हमारे लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकारों तक को भी नहीं जानता, जानना भी नहीं चाहता, इस पर साहित्यकार कब विचार करेंगे ?
जितने बड़े पद उतनी बड़ी समस्या ? साहित्यकार खेमों में बँटे हुए क्यों हैं? साहित्य में आन ने न जाने कब अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया ? क्या प्रश्न यह नहीं उठ खड़ा होता कि कार्यक्रम में "आन" से अधिक महत्त्वपूर्ण "आना" होना चाहिए था ? हमारे अहं ने "आना" के अंत से "" को ही समाप्त कर केवल "आन" लगा रखी है और हम अनजान हैं ?
साहित्यकार बनने के लिए बच्चों की तरह निर्मल होने में क्या हमारी बुद्धि बाधा नहीं बन रही है? वह बुद्धि ही किस काम की जो हमारी वास्तविक निर्मलता ही नष्ट कर दे ? अगर बुद्धिमानों की बुद्धि सचमुच बच्चों जैसी स्वच्छ हो जाए तो हमारी वर्तमान बुद्धि के मेल से क्या हम शुद्ध रचनाएँ रचकर बच्चों को नहीं दे पाएँगें ? हमारे अन्दर ऐसी बातों को समझने की शक्ति मौजूद तो है मगर महसूस करने की शक्ति कहाँ चली गई है ? आज समझने और महसूस करने में इतना फर्क कैसे आ गया है ? अगर हम जो समझ रहे हैं वही गहराई से महसूस करने की शक्ति अपने में से जाग्रत कर लें तो हमारी आधी से अधिक, बल्कि सारी समस्याएँ ही समाप्ति की तरफ़ क्या नहीं चल देगीं ?
      यह जो ऊपर से प्रेम का फेन है मगर अन्दर से ईर्ष्या, द्वेष और अहं का काला पानी, क्या यह समाज में भयावह स्थिति पैदा नहीं कर रहा है ? या फिर ऊपर से जमी हुई बर्फ के नीचे कैसी असह्य वेदनादायी शीतल धारा लगातार बह रही है ? आश्चर्य की बात क्या यह नहीं है कि सबको मालूम है कि ईर्ष्याजनित विचार मन में नहीं पैदा होने चाहिए, परंतु फिर भी हम लोग इन्हें किसी पालतू पशु की तरह पालते हैं ?
हो सकता है कि इनको छोड़ देने के उपाय भी मालूम हों, मगर यह सब विचार की सीमा से बाहर कैसे चला गया है? और जिनको मालूम है वे इसे अपनाने की मुद्रा में क्यों नहीं दिख रहे हैं ? बस, ‘सब कुछ चलता हैकी मुद्रा में कैसे आ गया है ? साहित्य, जिसका जन्म ही व्याधियों को समाप्त करने के लिए हुआ था, वह उस लक्ष्य से कोसों दूर कैसे हो गया है ? इसका कारण क्या यह नहीं है कि औषधि जिस वृक्ष से निकल रही है वह वृक्ष स्वयं ही विषैला हो गया है, उसकी जड़ों में विष व्याप्त हो गया है ? दूध में मिलावट और संभावित हानिकारक दवाओं के मिश्रण से बने होने के कारण माताएँ बच्चों को दूध न देना ज़्यादा फ़ायदेमंद कब तक समझती रहेंगी ? लेकिन हम कब तक बिना दूध के बच्चों को पालते रहेंगे ? क्या साहित्य के जनकों के अन्दर विष को समाप्त करने के कुछ उपाय नहीं होंगे जो उन्हें स्वच्छ बनाएँ ?
हम बाहर कहीं से भी अपने लिए कच्चे माल की तरह सामग्री ले लें, मगर क्या हमें उस कच्ची सामग्री को स्वच्छ कर अच्छी तरह पकाने के लिए कुछ उद्योग नहीं करना चाहिए ? इसके लिए चिंतन की आवश्यकता नहीं है क्या ?
क्या हम पूर्व के आदतन चिंतन से रहित हुए बिना कोई भी स्वच्छ और ताज़गी भरा मौलिक विचार कर पाएँगे ? जब तक हम बर्तनस्वच्छ नहीं करते तब तक स्वादिष्ट और तरो-ताज़ा साहित्य का आनन्द लेने-देने की कल्पना भी कैसे कर सकते हैं ? साहित्य जैसे महत्त्वपूर्ण उपादान को हम वर्षों से चले आ रहे ईर्ष्या-अहं ग्रस्त मन में कैसे पकाते चले आ रहे हैं ? संगीत में रियाज़ किया जाता है जिससे मन कर्म वचन सब साफ होते हैं, लेकिन साहित्य में क्या केवल लिखना ही रियाज़ हो सकता है? अपने को रोज़ मनोविकारों से मुक्त करने का भी प्रयास करना जरूरी नहीं है क्या?
आज अधिकतर नये या पुराने साहित्यकारों ने क्षिप्रकारिता’, अर्थात्जल्द से जल्द प्रकाशित और प्रचारित हो जाने की लालसा जैसे गुण पाल रखे हैं, क्या यह उन्हें मालूम भी है ? मूर्धन्य एवं गुरुवर्य साहित्यकारों के अनुरोध कि साहित्य के चसके से बचोपर विचार करने का समय नहीं आ गया है? ‘साहित्य का भूत मत सवार होने दो अपने आप परवाले उपदेश को कोई मानने को क्यों तैयार नहीं है? हम कब तक ऐसे विचारों को सर पर गठरी की भाँति ढोते फिरेंगे कि हमारा साहित्यकारों में नाम हो जाए ,  धाम बन जाए? इतना भर ही रह जाने से साहित्य-प्रेम बंजर धरती पर कहाँ से उपजेगा ? अपने अन्दर के साहित्य की उर्वर धरती को सबसे पहले स्वच्छ करने का उपाय कब किया जाएगा? हम फ़ालतू की इल्लतों से दूर होने का प्रयास करना कब आरंभ करेंगे?
      नवयुवक भी जिम में या कराटे में जाकर कुछ पाने के लिए अभ्यास करने की आवश्यकता महसूस करते हैं तो साहित्यकार बिना प्रशिक्षण के क्यों उतरे जा रहे हैं ?
यह क्यों नहीं समझ आता कि जैसे शारीरिक अभ्यास से धीरे-धीरे सब संभव होने लगता है उसी प्रकार साहित्य के अभ्यास से ही हम में साहित्यिक क्षमता का विकास होगा? यह क्या एक दिन में होगा? क्या यह सब अभ्यास के बिना होगा ? अपने शरीर के विज्ञान को न जाने क्यों और कब हमने कहाँ-कहाँ से जोड़ कर अपने आप को अलग कर लिया ?
हृदय की धड़कन से एक सङ्गीतमय लय नहीं निकलती ? अगर निकलती है तो क्या हमें उस संगीत को सुनने के लिए अपने अंगों पर एकाग्र होने का अभ्यास नहीं करना चाहिए ? शरीर के अन्दर के प्रत्येक अंग आपस में एक ही गति से चल रहें हैं तो क्या वे अनोखा संगीत पैदा नहीं कर रहे हैं ? आरकेस्ट्रा पार्टी में जिस प्रकार समान अन्तराल पर हर प्रकार के यन्त्र बजते हैं और आपस में मिल कर अद्भुत संगीत पैदा करते हैं, वैसे ही क्या हमारे सारे आंतरिक अंग - फेफड़ा, हृदय, उदर, प्लीहा आदि अपने-अपने काम करने के लिए गतिमान होकर संगीत पैदा नहीं कर रहे हैं ? बाहर के आरकेस्ट्रा को सुनने के लिए हमें कान की जरूरत पड़ती है लेकिन क्या सूक्ष्म संगीत को सुनने के लिए हमें कान को ही एक अभ्यास प्रक्रिया से होकर नहीं ले जाना चाहिए? क्या हमें अपने अन्दर के इस भौतिक संगीत को सुनने के अभ्यास नहीं करने चाहिए, ताकि उसे साहित्य में उतारा जा सके? मगर यह बिना अभ्यास के संभव कैसे हो पाएगा? और जबकि यह साहित्यिक यात्रा की केवल भ्रूणीय अवस्था मानी जाएगी।
और अगर ऐसा कुछ नहीं होगा तो साहित्य का क्या होगा ? क्या हम अपने आंतरिक संगीत को सुने बिना ही साहित्य के गीतों में हृदय के गीत समा पाएँगे ? हम केवल अपना भला करने के भ्रमित प्रयास में जुटे रहेंगे तो अपना भला भी कैसे होगा ?
क्या हमें संयम की आवश्यकता नहीं है? अपने विचारों पर संयम की, अपनी प्रतिक्रियाओं पर संयम की ? जिस प्रकार प्रेम-संयम, व्यय-संयम, क्षुधा-संयम, यौन-संयम के बाद अनोखा वरदान प्राप्त होता है उसी प्रकार क्या साहित्य-संयम के बाद हमें ऐसा साहित्य प्राप्त होने की संभावना नहीं है जो लोक-कल्याणकारी, मंगलकारी होने के साथ साथ कालजयी होगा ? क्या यह सदियों से नहीं होता आया है ? साहित्य संयम की स्थिति हासिल करने से पहले क्या हमें स्व-संयम की आवश्यकता नहीं है? हम संयम के बिना महान साहित्य को धारण कर लेंगे ?
दूसरी तरफ़ हमारे आस-पास साहित्य के बरगद के रूप में जो साहित्यकार अपनी छाँव लिए, अपनी विशाल शाखाएँ फैलाए, अपने वास स्थान पर बैठे हैं, उनके सान्निध्य में रहकर उनके जीवन से क्या हमें कुछ लेने की जरूरत नहीं है ?
क्या उनके साहित्य को सबसे पहले दीये की तरह जलाकर अपने अनुष्ठानों में रखना आवश्यक नहीं है ? क्या वे दिन ब दिन नई जड़ें पैदा कर ज़मीन में धंसा नहीं रहे हैं, और जो भी उनके सान्निध्य में आता है, उसे अपनी शीतलता और अपनी गुणवत्ता भी उन्हें बिना बताए ही प्रदान नहीं कर रहे हैं ? तो क्या हमें इनके पास जाने की आवश्यकता नहीं है, अपनी पहचान दूर दूर तक सोशल मीडिया में फैलाने के साथ-साथ ?
इन सारे प्रश्नों के कटघरे में हम सब क्यों असहाय से खड़े हैं ? क्या साहित्यकार की सच्चाई आज मुख्य धारा में है ? यह केवल आम पाठक को ही मालूम है या साहित्यकार-गण भी जानते हैं ? इसकी भयावहता से क्या सभी अवगत नहीं हैं ? हमारे गणमान्य साधक साहित्यकार सब कुछ देख-सुन कर, अपनी जीवन की सारी निधियाँ हमें समर्पित कर इस परिस्थिति की तरफ़ कब तक इस कदर देखते रहेंगे कि अब कोई नया पौधा उगकर दूषित वातावरण को स्वच्छ करने की प्रक्रिया प्रारंभ करे ?

- संपादक मंडल,
मरुतृण साहित्य-पत्रिका

आपकी बात के विषय में : पाठकों से अनुरोध  है कि वे अपनी प्रतिक्रिया मरुतृण में छपी रचानाओं के विषय में दें ताकि रचनाकार अपनी रचना प्रक्रिया में सतत आगे बढ़ते रहे न कि केवल पत्रिका का गुणगान होकर रह जाए । आपकी बातरचनाकार और पाठक के बीच सेतु की तरह कार्य करता है, इस सेतु को संबल देना आप सभी का स्नेहित दायित्व है । अपनी रचना के साथ पत्रिका के किसी  अंक पर अपने संक्षिप्त विचार अवश्य भेजें ताकि यह सेतु कार्यरत रहे । साधारण  पाठक  भी अवश्य अपनी प्रतिक्रिया अपनी साधारण  भाषा में  निःसंकोच  दें ।


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