अध्यात्म को सामान्यत: उस परम स्रोत या केन्द्र के रूप में माना जा सकता है जिससे चेतना की सुधियों का प्रवाह निर्गमित होता है और इस व्यापक संसार के रूप में अस्तित्व कायम कर लेता है। किसी भी विषय या तत्व में मूलभूत प्रकार से एक केन्द्र की अवधारणा कर लेने पर बुद्धि को कुछ राहत तो मिल ही जाती है, और अध्यात्म की भी ठीक यही उपयोगिता है।
चेतना का यह विशद तरंगमयी प्रवाह जिस स्वरूप में एक अत्यंत वर्ण-भावमय गतिशील स्थिरवत्ता प्राप्त करता है उसे हम प्रकृति के रूप में संबोधित कर सकते हैं। प्रकृति की इस तरंगमयी बगिया में ही जीवन पुष्पित पल्लवित हो रहा है।
इस समूचे प्रकल्प में धर्म क्या है। यह प्रकृति के सहज व्यापक भेदातीत प्रवाह को बांधने की चेष्टा से किए गए बन्धकर्म यानी बांध निर्माण की सत्यनिष्ठ रूपरेखा की भांति देखा जा सकता है और जिसका उद्देश्य चेतना की सुधियों को इतस्तत: विरक्त न होने देकर कल्याणकर दिशाओं में ही उन्मुख किया जाए। धर्म मानवता प्रधान है, हालांकि इसमें निहित करुणा में समस्त जीवन विस्तार पर्यवसित हो जाता है। ध्यान देने की बात यह है कि धर्म प्राकृतिक भी है और अतिप्राकृतिक भी, स्वाभाविक भी है और अतिस्वाभाविक भी, मानवीय भी है और अतिमानवीय भी!
इस खंड में हमारा प्रयास नियमित रूप से ऐसी सामग्री उपलब्ध कराने का रहेगा जिससे धर्म और अध्यात्म के विषय में उठ रही व्यर्थ की बातों पर विराम लगे, पाठक के चित्त को संतोष हो और उसके विचार-देश में रचनात्मक प्रेरणा का संचार हो।
ध्यान के माध्यम से बचपन और युवावस्था की प्राप्ति
अपने सखा को एक पत्र,
जानते हो सखा ! ध्यान के माध्यम से हम बच्चों-सा निर्मल और स्वच्छंद हृदय फिर से पा सकते हैं । किशोरों सा प्रेममय उमंग पा सकते हैं । नये-नवेले वैवाहिक जोड़ो सा स्वप्नशील और आनंददायक जीवन की अनुभूतियाँ पा सकते हैं किसी भी उम्र के पड़ाव पर जाकर । और न
जाने क्या क्या पा सकते हैं ! और हाँ! इस प्रकार के प्राप्ति के समय हमें सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि हमारे पास अपने अनुभवों का हथियार भी हमारे पास ही रहता है जिसके कारण हम कभी भी बचपन जैसा गैर जिम्मेदाराना नहीं हो सकते, किशोरों जैसा उन्मादी नहीं हो सकते, पौढ़ों
जैसा निराश नहीं हो सकते और वृद्धों जैसा असहाय नहीं हो सकते हैं ; अर्थात् हम किसी भी स्थिति में अपनी जिम्मेदारियों को दरकिनार नहीं कर सकते ।
जानते हो सखा सबसे बड़ी बिडम्बना क्या है हमारी ? हम गृहस्थ लोग यह समझते हैं कि
हमारा वैवाहिक जीवन, ध्यान के माध्यम से संयास की तरफ़ जाने लगेगा है जबकी कर्मयोग
में विवेकानन्द भी कहा कि “ मैं अब महानिर्वाण- तन्त्र से गृहस्थ के
कतर्व्य-संबंधी कुछ श्लोक उद्धृत करता हूँ...”युक्ताहारो युक्तनिद्रो मितवाड्.
मितमैथुन: “ अर्थात् गृहस्थ्को आहार, निद्रा, भाषण, मैथुन इत्यादि सब बातें
परिमित रूप से करनी चाहिए । यहाँ किसी भी चीज के लिए मनाही नहीं है बस परिमित रूप
को पहचान कर आगे बढ़ना है ।
जानते
हो सखा ! मैं तो ऐसी स्थिति के बारे में सोच कर ही रोमांचित हो रहा हूँ क्योंकि यह एकदम से संभव है । अब मुझे याद आ रहा है कि क्यों मैं किसी-किसी पूरे दिन मन में आनंद की अनुभूति अनायास करता आया हूँ । कभी
बाल हृदय सी अनुभूति तो कभी अपने किशोरावस्था की अनुभूति आकर मुझे अपने साथ ले
जाते हैं । सोचने पर मालूम पड़ता
है कि उस दिन ’ ध्यान
’ बहुत ठीक से लगा था । ध्यान ठीक से लगने के कारणों में प्राथमिक रूप से पाया था कि पेट साफ और हलका था । पेट के बारे में सोचा तो पाया था कि पिछले दिन सुपाच्य और सादा भोजन किया था । अच्छा ध्यान लगने के पीछे इतना संबंध सीध-सीधे समझ में आ रहा था । बचपन का हृदय कुछ समय के लिए पाने के लिए सारा रहस्य स्पष्ट हो किसी शांत सरोवर में छवि के तरह उभरने
लगा है । इसी प्रकार कई-कई दिन अपने प्रारंभिक वैवाहिक जीवन की अनुभूतियाँ अपनी
सारी इच्छाओं और कर्मों के साथ ऊभर कर सामने आ जाती है और पूरे दिन बनी रहती हैं
।
मुझे याद आ रहा है कि मैंने कहीं पढ़ा था कि ध्यान से ये क्षणिक भाव स्थायी हो जाते हैं । अपने वश में हो जाते हैं । यानी कि जब चाहे तब हम वैसी भाव जितना समय के लिए चाहें ग्रहण कर सकते हैं ।
अब देखो न सखा ! मुझे ध्यान हो रहा है कि रामकृष्ण परमहंस देव कभी-कभी बच्चों से हरकत किया करते थे । माता भगवती को मछली खिलाने का जिद किया करते थे । भोग लगाने से पहले स्वयं खा लिया करते थे । मैं ये नहीं कहता कि हमें भी वैसा ही करना चाहिए, मगर हम इतना तो कर ही सकते हैं कि उनके इस भाव को हृदय में ग्रहण करने की कोशिश तो कर ही सकते हैं । उनके कर्मों पर विश्वास तो कर ही सकते हैं । तभी तो हमें भी अपने कर्मों पर विश्वास होगा ।
अब देखो न सखा, बुद्धि भी अपना जोर लगना शुरू कर रहा है इस
समय । हालांकि हमें यह एहसास है कि यहाँ पर बुद्धि का कोई काम नहीं होता । फिर भी यह भी तो सत्य है कि हम जब इस जगत में विचरण करते हैं तो अपनी बुद्धि को साथ लेकर ठीक वैसे ही चलना चाहिए जैसे कोई वृद्ध
भीड़ भाड़ वाली सड़क पर या दूर की किसी यात्रा पर एक नवयुवक को अपने साथ ले कर चलता है । लेकिन ऐसा नहीं है कि वह वृद्ध हमेशा नवयुवक की
सहारा लेकर से ही चलता है, देखने
वाली बात यह है कि कोई भी वृद्ध हर समय जब वो सुरक्षित स्थान पर होगा है तो वह
अपने अनुसार ही चलता है मसलन घर में, किसी
ख़ूबसूरत बाग़ीचा में या फिर किसी मंदिर में, जब वह
प्रवेश कर जाता है तो वह स्वच्छंद रूप से अपनी आत्मा के अनुसार विचरण और आचरण करता
है । ऐसा कोई वृद्ध ही क्यों एक बालक भी ऐसा ही करता है इस समय और हम करने भी देते
हैं यानी बुद्धि को कोई ऐतराज नहीं होता । इसलिए हमें हमेशा बुद्धि के बस नहीं
रहना चाहिए लेकिन भीड़ भाड़ और चहल पहल, संकट
तथा जीवन की अन्य किसी भी परिस्थिति में बुद्धि का सहारा अवश्य लेना चाहिए । इसलिए चलो इस विषय पर अपनी बुद्धि की भी सुन लेते हैं । बुद्धि कहता है कि ध्यान से आत्मा पर पड़े सारे परत हटने लगते हैं और आत्मा का वास्तविक रूप सामने आता है । अरे ! यह कैसे संभव है पूछने पर बुद्धि कहता है कि दरअसल आत्मा पर कई तरह की भावनाओं ने एक- एक कर परत बनते गये है बचपन से ही । बचपन में मन निर्मल था, किशोरावस्था में मन चंचल था , युवावस्था में स्वप्नशील था, अब जिम्मेदारियों को भय बना लिया है मन ने । मन की आज की अवस्था आने में कई प्रकार के भावों ने परत बनना शुरू किया
था प्रत्येक मानक के जीवन में शुरू से ही । ’भय ’ नामक भाव ने आकार बचपन को आक्रांत किया, मन पर क़ब्जा जमाया, क्रोध ने किशोरावस्था आते-आते अपना एक महल ही बना लिया मन के अन्दर, लोभ आदि अनेक भावनाओं ने हमारे मन पर किसी साम्राज्यवादी राजा की तरह अधिकार कर लिया
और हम कब गुलाम बन गये हमें पता ही नहीं चला । और इन भावनाओं ने जो चाहा हमसे करवाया - क्रोध
ने आपस में झगड़ा करवाया, लोभ ने
दूसरों के नजर में गिराया, वासनाओं
ने हमें एक दूसरे के नजरों में गिराया ; आदि
आदि न जाने क्या क्या हुआ हमारे साथ ।....जानते
हो सखा ऐसा क्यों हुआ ? ऐसा
इसलिए हुआ कि हमें इन घुसपैठियों को बाहर निकालने का उपाय नहीं मालूम था । वे आकर
आतंकवादियों की भाँति हमारे मन रूपी घर पर कब्जा कर लिए और अपनी बंदूक के बल पर
हमसे जो मर्जी तो करवाते रहे । और तो और हम करते भी रहे । लेकिन जानते हो सखा ! हमें अब पता चल गया है कि किस प्रकार इन घुसपैठियों को मन के दरवाजों पर ही
रोका जा सकता है । बस इन्हें दरवाजों पर ही रोकने का अभ्यास करना है । पहले पहल ये
जबरन हमारे मन में प्रवेश कर आते थे । लेकिन ध्यान के अभ्यास के द्वारा इन्हें अब
बहुत देर तक दरवाजे पर रोका जा सकता है । लेकिन जानते हो सखा इन्हें अब तक पूरी
तरह नहीं रोकना संभव हो पाया है । ये कभी न कभी हमारे मन के द्वार में प्रवेश कर
ही जाते हैं । लेकिन सखा ! हम यह
भी जानते हैं कि एक दिन इन्हें दरवाजे पर भी टीकने का साहस नहीं होगा क्योंकि
आत्मा पर से जिस दिन सारे कुभावनाओं (लोभ, क्रोध, मोह ईर्ष्या आदि) के
आवरण हट जाएँगे उस दिन उसमें से प्रकाश निकलेगा और सब को निगल जाएगा । (ऐसा हमारा अतीत के मनीषियों का कहना है)
जानते हो सखा ! बुद्धि कहता है कि ध्यान के माध्यम से हम इन भावों को रोकने का ही तो प्रयास शुरू करते हैं । जब हम एकाग्र होते हैं तो सारे भाव, सारी भावनाएं एक-एक कर हमारे मानस पटल पर चारों तरफ़ से आकर हमला करने लगते हैं, हमारे
मन पर जबरन अधिकार जमाना चाहते हैं; इसलिए
आसानी से हमारा ध्यान एकाग्र नहीं होता है; ( जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने राजयोग में कहा है) जब हम लगातार ध्यान के अभ्यास के माध्यम से इन भावों को मन के अंदर से होते हुए आत्मा को ढकने के प्रयास को रोक देते हैं तो सब धीरे-धीरे अपने बस में होने लगता है । बस अभ्यास की जरूरत है ।
जानते हो सखा ! शायद इसी कारण से स्वामी विवेकानंद ने ध्यान को संपूर्ण वैज्ञानिक करार देते हुए अपनी व्यथा व्यक्त की है जिसे आज समझा नहीं जा रहा है।
अब देखो ना सखा ! जिस
अध्यात्म के गहराइयों का खोज पश्चिम ने अपने बलबूते वैज्ञानिक ढंग से प्रारंभ कर दिया है उसे हम भारत के लोग समझना
भी शायद ही प्रारंभ किये हैं और किये भी हैं तो जनसाधारण
तक अभी पहुँचा बाकी है । फिर से विवेकानन्द याद आ रहे हैं, सखा, कि उन्होंने कर्मयोग नामक पुस्तक में कहा है कि आज
समाज दो भागों में बँट गया है एक तो हम गृहस्थ हैं जो पूरी तरह अपनी जीवन यापन के
लिए केवल धन की तरफ़ भाग रहे हैं और दूसरी तरफ़ योगी अपनी योग बल से संसार को कुछ
देने की कोशिश में संसार से दूर ही चले गये हैं । एक बहुत बड़ा खाई पैदा हो गया है
। जबकि जरूरत है कि योगियों का योग बल संसार के कामों में लगे यानी संसारी भी कुछ
हद तक योगी बने, और जो योगी हैं वे तो अपने कार्य कर ही रहे हैं अपने
योग बल से ; लेकिन जरूरत है कि वे भी संसार से भाग कर हिमालय की
तरफ़ न गमन कर संसारियों को योग से परिचय करवाते हुए संसार को एक ही दिशा में ले
जाने का प्रयास करें अपने उज्ज्वल चरित्र के प्रदर्शन से । अंत की तरफ़ लेकिन अंतिम
नहीं, सखा ! मुझे
फिर से विवेकानंद ही ध्यान में आ रहे हैं कि उन्होंने कहा है कि राजयोग (ध्यान के बारे में), कर्मयोग, ज्ञानयोग या फिर प्रेमयोग सभी के बारे में एक मनुष्य को अनुभूतियाँ होनी चाहिए
भले ही वह किसी एक योग को अपने जीवन में अपना कर आगे बढ़े ।
जानते
हो सखा इसे छोड़ना होगा समय पर ही पर हम व्यक्तिगत स्तर पर समय के भरोसे बैठ भी तो
नहीं सकते हैं न !
-
- सत्य प्रकाश ’भारतीय’






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