क्या अनचाहा हो रहा है, यह हम सब कह सकते हैं; मनचाहा क्या होना चाहिए, हममें से कम ही लोग कह सकते हैं; यह कैसे होना चाहिए, उससे भी कम लोग कह सकते हैं। और हम क्या कर रहे हैं, यह कहने का माद्दा उससे भी कम लोगों में है । अपनी करनी को कहने का अधिकार तो सबको होना चाहिए, है ही, पर कितने हैं जो सलीके से उसे कहते हैं, कहना चाहते हैं? ऐसा करनेवालों की संख्या सबसे कम है, भले ही उनको सुननेवाले न हों या न के बराबर हों । यही हमारे कर्म का वास्तविक चलचित्र है । किसी ने बड़ी गहरी बात कही है कि हमें सामनेवाले की समझने बूझने की योग्यता और मंशा को आंकना तो जरूर चाहिए, परंतु कभी ऐसी नौबत भी आ सकती है कि हमें अपने द्वारा अनुभूत सत्य को अपनी पूरी वाक्-क्षमता दांव पर रखकर कह देना पड़े, भले ही ऐसा लगे कि सामनेवाला उसे ग्रहण नहीं कर पायेगा। हमें केवल यह देखना चाहिए कि उक्त परिस्थिति में उसे उस सत्य की कितनी जरूरत है। कई बार देखने में आता है कि व्यक्ति को कोई संतोषजनक तार्किक कारण न मिलने पर भी वह सामनेवाले के सशक्त चरित्र और हाव-भाव को देखकर उसकी बात मान लेता है और बाद में वह पाता है कि उसने बात मानकर ठीक किया था। इस अद्भुत सत्य से जीवन में कई बार लोगों का सामना होता है। हमारा अपनी बात को इस डर से न कहना कि उसे कोई मानेगा नहीं, हमारी चुप्पी को सार्थक नहीं बना देता। हमारा किसी मूल्ययुक्त बात पर यथोचित बल देकर कहना, और किसी का उस पर ध्यान न देना – ये दोनों दो स्वतंत्र क्रियाएँ हैं, इन्हें गड्ड-मड्ड नहीं किया जा सकता। यदि किसी बात में सत्य है और उसे उस सत्य की गरिमा के साथ व्यक्त किया गया है तो उसकी सार्थकता उतने में ही हो जाती है। यह सार्थकता उसके ध्यानपूर्वक सुने या माने जाने पर निर्भर नहीं है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि कई बार उपेक्षा की शिकार, लेकिन प्रखरता से कही जाती रही बातों को अपनाकर पुराने पापों का योग्य परिष्कार किया गया है। सामना किया जाता है उस सत्य का जिसकी लंबे समय से अनदेखी की जा रही थी। लेकिन ऐसी बात कही तक न गयी होती तो उसकी उपेक्षा भी नहीं की गयी होती, उसे बाद में अपनाये जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।
मान लीजिए किसी सहकर्मी के बच्चे की तबीयत अचानक बिगड़ जाए । स्थानीय डॉक्टरों ने सलाह दी हो कि उसकी तत्काल शल्यचिकित्सा कराई जाए, लेकिन उसके शुभचिंतक घरवाले उससे कहें कि बच्चे को एक बार वेलोर में दिखा लाओ – हो सकता है ऐसी जोख़िम भरी शल्यचिकित्सा न करनी पड़े । दूसरी ओर कुछ सहकर्मी सोच रहे हों कि इतनी दूर ले जाने का संकट उठाना ठीक नहीं, यहीं, इसी शहर में चिकित्सा करवानी चाहिए। लेकिन ऐसी बात कौन समझाए? कौन बीच में पड़े? कोई अनर्थ हुआ तो उसका दोषी कौन बनेगा ? लेकिन अगर कुछ लोग तय कर लें कि सहकर्मी को अपनी पूरी क्षमता और विश्वास से वर्तमान परिस्थितियों की गंभीरता दर्शा दी जाए - बाकी उसकी मर्जी !... ऐसी परिस्थिति में बहुधा ऐसा होता है कि इलाज जल्द से जल्द अपने शहर में ही सही जगह कराया जाता है और बच्चा स्वस्थ भी हो जाता है, जबकि दूर कहीं ले जाने में समय गँवाना जानलेवा हो सकता था । अपनी बात पूरे मन से कह देने से वह सामनेवाले के पास किसी न किसी रूप में पहुँचती है, चाहे सामनेवाला उसे मानने के पक्ष में न भी रहे । सत्य भी अपने आप, पानी की तरह, अपना तल खोज लेता है । असल में होता यह है कि एक सूक्ष्म अहं, अच्छे से अच्छे संयमी मनुष्य के अवचेतन मन में पड़ा रहता है, जिसके कारण हम सामनेवाले की वाजिब बातों को भी एक ही बार में वाजिब नहीं मानना चाहते।
अवश्य ही ऐसे भाव-व्यापार अवचेतन मन की पृष्ठभूमि में होते हैं और इनमें समय लगता है। यह भी कह सकते हैं कि प्रत्येक संतुलित कार्य में प्रकृति की अपनी कुछ शर्तें, कुछ तौर-तरीके होते हैं जिनके निर्वाह में समय लगता है। लेकिन आजकल ज़िंदगी का तकाज़ा कुछ ऐसा है कि हम एक-दो से ज्यादा प्रयास करने में यकीन नहीं रखते। यदि इतने में सामनेवाले को समझ आ जाये तो ठीक, नहीं तो जय राम जी की! तुम अपने रास्ते और मैं अपने! होना यह चाहिए कि हम अपने दृष्टिकोण को और उदार, और समावेशी बनायें । जो और जैसा हम चाह या सोच रहे हैं, वह और वैसा नहीं भी हो सकता है - इस परिस्थिति के प्रति अभी से ज्यादा संवेदनशील स्वीकारभाव विकसित करें। हमें सोचना चाहिए कि किसी के एक-दो बार कह देने मात्र से कोई अपने विचार कैसे बदल सकता है, खासकर तब, जब हम भी उससे कोई बहुत बेहतर न हों! कोई बात हमें केवल मुंह से नहीं कहनी है, न ही अगले को केवल कानों से सुननी है। हम किसी बात के कहने को उसकी संपूर्ण जिम्मेदारी के विस्तृत फलक पर देखें। ऐसा कर सकने पर हम देखेंगे कि ऐसी बहुत-सी बातें हमें कहने योग्य ही नहीं लगेंगी जिन्हें हम कहने के आदी थे। दूसरी ओर, हम ऐसी कई बातों को अभी से कहीं ज्यादा बढ़ी हुई चेतना और मार्मिकता से करेंगे जिन्हें पहले करते ही नहीं थे या अधर में छोड़ दिया करते थे ।
कई बार यह भी होता है कि हम सोचते हैं अगला हमें समझ ही नहीं पायेगा, उसमें वैसी क्षमता नहीं है, पर हो सकता है हम गलत हों। अक्सर हमें लगता है कि किसी नन्हे बच्चे को हम कितना भी समझाएँ वह नहीं समझ पायेगा, परंतु समय आने पर वह ऐसा कुछ कर देता है कि हम दंग रह जाते हैं । हमारे एक मित्र की बच्ची जब मात्र छह महीने की थी तो वह खेलते-खेलते बिस्तर के किनारे पर आ जाया करती थी। एक दिन हमारे मित्र अपनी बच्ची को खेल-खेल में तोतली ज़ुबान में बताने लगे, "गुड़िया यहाँ मत आओ गिर जाओगी "। उसके बाद से जब कभी बच्ची किनारे पर आती तो मित्र उससे वही बात दुहराते । उनकी बातें सुनकर वह बच्ची सिर्फ उनकी तरफ़ कुतूहल भरी निगाहों से देखती, मानो नेत्रों से ही वार्तालाप कर रही हो । और कुछ दिनों में उनकी वैसी बातें सुनकर बच्ची किनारे से हटकर बिस्तर के बीच में चली जाने लगी। वह बच्ची कभी भी बिस्तर से नहीं गिरी । वह माता-पिता को देखकर ही बिस्तर के बीच में चली जाया करती। काफी बाद में तो वह बिस्तर का किनारा देखकर ही बीच में चली जाती । इस सब की शुरुआत करते समय हमारे मित्र को वैज्ञानिक पैवलव का प्रयोग और सिद्धांत शायद ही याद रहा हो । ऐसे ही एक दिन अपनी बच्ची को सीढ़ियों से उतरने की कोशिश करते देखकर मेरे मित्र को उसे सीढ़ियों पर चढ़ने-उतरने का सही तरीका सिखाने का विचार आया था।
इस बच्ची के पिता ने जितनी सूझ-समझ, संयम और दूरदर्शिता का परिचय दिया, वैसी ही अपेक्षा साहित्यकारों से करना समाज का अधिकार है। साहित्यकार या रचनाकार अन्य व्यक्तियों से भिन्न होता है, केवल बौद्धिक क्षमता में ही नहीं, अपनी बोध चेतना में भी! वह शब्दों का चितेरा होता है। एक उदाहरण लीजिए। संगीत में सात शुद्ध स्वर हैं, चार कोमल और एक तीव्र, यानी कुल मिलाकर बारह तरह के स्वर होते हैं। इनके तीन सप्तक माने जा सकते हैं। लेकिन संगीत की मात्र इतनी मूल सामग्री से चार सौ से भी अधिक राग बनाये गये हैं, और उनमें से प्रत्येक राग में सैकड़ों धुनें निकाली जा सकती हैं। विश्व में जितनी भी धुनें हैं वे इन्हीं बारह मूल स्वरों के भिन्न-भिन्न संयोगों के परिणाम हैं, प्रत्येक धुन अपनी एक अलग पहचान और स्थान रखती है।... इस बात को हम यदि साहित्यिक सृजन पर लागू करें तो कहा जा सकता है कि संगीत में जो स्थान स्वरों का है वही भाषा में शब्दों का, और इस दृष्टि से देखें तो जितनी भी साहित्यिक कृतियाँ हैं वे शब्दों के विभिन्न अंतराय संयोगों से मिलकर बनी हुई धुनें हैं जिनका अपना स्वतंत्र संप्रेष्य और मधुरता है। लेकिन यहाँ पर रचनाकार की विलक्षण प्रतिभा या ‘जीनियस’ की चर्चा करना जरूरी है। ‘जीनियस’ शब्द की एक अर्थ-छटा सृजन-क्षमता की ओर भी संकेत करती है। सच्चे रचनाकार की खासियत यह है कि वह परंपरा से चले आये शब्दों में संवेदना के स्तर पर नये अप्रत्याशित अर्थ फूंक देता है। शब्द वही होते हैं, लेकिन भावना या बोध के स्तर पर वे एक सर्वथा नवीन व्यंजना की सृष्टि करते हैं, जो जितनी नवीन होती है, बहुधा उतनी ही सार्वजनीन भी होती है— उसे उसी तरह हृदयंगम किया जा सकता है, जैसे उस भाषा में कही गयी किसी भी बात को किया जाता है। धूमिल की रचना का उदाहरण लेते हैं: एक आदमी, रोटी बेलता है,
एक आदमी रोटी खाता है,
एक तीसरा आदमी भी है,
जो न रोटी बेलता है,
न रोटी खाता है
वह सिर्फ रोटी से खेलता है...
यहाँ सीधे सरल वाक्य हैं लेकिन इस वाक्य रचना का परिपाक एक बिलकुल नयी, बल्कि चमत्कारिक व्यंजना में होता है। यहाँ केवल अनुप्रास नहीं है, केवल सरल कुछ रोजमर्रा की बातें नहीं है, इससे बहुत आगे इसमें व्यापक तौर पर समाज में फैली आर्थिक कुप्रथाओं का बिम्ब देखने को मिलता है जो मानव-सभ्यता और उसके मूल्य-बोध पर एक कलंक है। ‘रोटी से खेलना’ मानव की भावनाओं से खेलने का ही एक प्रतीक है। सच्चे रचनाकार में इस तरह की एक मौलिकता होती है जो दामिनी की तरह साधारण अर्थगत परिदृश्य में एक आकस्मिक कौंध पैदा कर देती है। सृजनधर्मी लोग और पाठक-श्रोता इस कौंध को देखकर विस्मित और आनंदित होते हैं, साथ ही वे एक सृजनरत हृदय से प्रकट सार्वजनीन सत्य की व्यापकता का भी साक्षात्कार करते हैं, और ऐसा अनुभव करते हैं कि कवि या लेखक ने उस सार्वजनीन सत्य को उद्घाटित करने के लिए ही वह रचना विशेष रची थी। परंतु रचनाकार कोई रचना क्यों करता है, यह तो वही बता सकता है।
समाज में, रचनाशील समाज में भी कई प्रकार के व्यक्ति (और संस्थाएँ) संचालित होते रहते हैं। शुद्ध रचनाधर्मिता के अलावा रचनाकारों में अलग-अलग प्रकार की चेतनाएँ देखी जाती हैं जो उन्हें क्रियाशील रखती हैं। इनमें स्वांत: सुखाय, स्वाध्याय, वाग्विलास, यश-कीर्ति, प्रतिष्ठा एवं पुरस्कार से लेकर धनोपार्जन तक कई उद्देश्य हो सकते हैं, और समाज में इन सभी उद्देश्यों को किसी न किसी रूप में बने रहने का लोकसम्मत अधिकार प्राप्त है। लेकिन मजे की बात यह है कि इन सभी घटकों से विशिष्ट या साधारण पाठक-श्रोता की जो आस बंधी होती है वह एक ही होती है – व्यापक सरोकारयुक्त तरोताज़गी भरा मनोरंजन। केवल तथ्यों का दुहराव-तिहराव नहीं, केवल सूचनापरकता की बोझिलता नहीं, केवल यथार्थ का मलीदा नहीं बल्कि आनंद-विभोर करनेवाली हृदय हिलोर, जो हममें सत्य का शक्ति-संचार करे, हमारे जीवन को श्रेष्ठ लक्ष्य की ओर उन्मुख करे ! इससे कम में हो सकता है पाठक-श्रोता मान भी जाये, लेकिन ऐसे में वह केवल काम चला रहा होता है, वैसे ही जैसे किसी परदेस में जब हमें खाने के लिए कुछ ढंग का नहीं मिलता तो हम चना-मूंगफली या संतरा खाकर अपने को बहला लेते हैं कि हमारे पेट में कुछ जा रहा है! हमें यह भी नहीं भूलना है प्रत्येक रचनाकार साथ-साथ एक पाठक-श्रोता भी होता है।
मान लीजिए किसी सहकर्मी के बच्चे की तबीयत अचानक बिगड़ जाए । स्थानीय डॉक्टरों ने सलाह दी हो कि उसकी तत्काल शल्यचिकित्सा कराई जाए, लेकिन उसके शुभचिंतक घरवाले उससे कहें कि बच्चे को एक बार वेलोर में दिखा लाओ – हो सकता है ऐसी जोख़िम भरी शल्यचिकित्सा न करनी पड़े । दूसरी ओर कुछ सहकर्मी सोच रहे हों कि इतनी दूर ले जाने का संकट उठाना ठीक नहीं, यहीं, इसी शहर में चिकित्सा करवानी चाहिए। लेकिन ऐसी बात कौन समझाए? कौन बीच में पड़े? कोई अनर्थ हुआ तो उसका दोषी कौन बनेगा ? लेकिन अगर कुछ लोग तय कर लें कि सहकर्मी को अपनी पूरी क्षमता और विश्वास से वर्तमान परिस्थितियों की गंभीरता दर्शा दी जाए - बाकी उसकी मर्जी !... ऐसी परिस्थिति में बहुधा ऐसा होता है कि इलाज जल्द से जल्द अपने शहर में ही सही जगह कराया जाता है और बच्चा स्वस्थ भी हो जाता है, जबकि दूर कहीं ले जाने में समय गँवाना जानलेवा हो सकता था । अपनी बात पूरे मन से कह देने से वह सामनेवाले के पास किसी न किसी रूप में पहुँचती है, चाहे सामनेवाला उसे मानने के पक्ष में न भी रहे । सत्य भी अपने आप, पानी की तरह, अपना तल खोज लेता है । असल में होता यह है कि एक सूक्ष्म अहं, अच्छे से अच्छे संयमी मनुष्य के अवचेतन मन में पड़ा रहता है, जिसके कारण हम सामनेवाले की वाजिब बातों को भी एक ही बार में वाजिब नहीं मानना चाहते।
अवश्य ही ऐसे भाव-व्यापार अवचेतन मन की पृष्ठभूमि में होते हैं और इनमें समय लगता है। यह भी कह सकते हैं कि प्रत्येक संतुलित कार्य में प्रकृति की अपनी कुछ शर्तें, कुछ तौर-तरीके होते हैं जिनके निर्वाह में समय लगता है। लेकिन आजकल ज़िंदगी का तकाज़ा कुछ ऐसा है कि हम एक-दो से ज्यादा प्रयास करने में यकीन नहीं रखते। यदि इतने में सामनेवाले को समझ आ जाये तो ठीक, नहीं तो जय राम जी की! तुम अपने रास्ते और मैं अपने! होना यह चाहिए कि हम अपने दृष्टिकोण को और उदार, और समावेशी बनायें । जो और जैसा हम चाह या सोच रहे हैं, वह और वैसा नहीं भी हो सकता है - इस परिस्थिति के प्रति अभी से ज्यादा संवेदनशील स्वीकारभाव विकसित करें। हमें सोचना चाहिए कि किसी के एक-दो बार कह देने मात्र से कोई अपने विचार कैसे बदल सकता है, खासकर तब, जब हम भी उससे कोई बहुत बेहतर न हों! कोई बात हमें केवल मुंह से नहीं कहनी है, न ही अगले को केवल कानों से सुननी है। हम किसी बात के कहने को उसकी संपूर्ण जिम्मेदारी के विस्तृत फलक पर देखें। ऐसा कर सकने पर हम देखेंगे कि ऐसी बहुत-सी बातें हमें कहने योग्य ही नहीं लगेंगी जिन्हें हम कहने के आदी थे। दूसरी ओर, हम ऐसी कई बातों को अभी से कहीं ज्यादा बढ़ी हुई चेतना और मार्मिकता से करेंगे जिन्हें पहले करते ही नहीं थे या अधर में छोड़ दिया करते थे ।
कई बार यह भी होता है कि हम सोचते हैं अगला हमें समझ ही नहीं पायेगा, उसमें वैसी क्षमता नहीं है, पर हो सकता है हम गलत हों। अक्सर हमें लगता है कि किसी नन्हे बच्चे को हम कितना भी समझाएँ वह नहीं समझ पायेगा, परंतु समय आने पर वह ऐसा कुछ कर देता है कि हम दंग रह जाते हैं । हमारे एक मित्र की बच्ची जब मात्र छह महीने की थी तो वह खेलते-खेलते बिस्तर के किनारे पर आ जाया करती थी। एक दिन हमारे मित्र अपनी बच्ची को खेल-खेल में तोतली ज़ुबान में बताने लगे, "गुड़िया यहाँ मत आओ गिर जाओगी "। उसके बाद से जब कभी बच्ची किनारे पर आती तो मित्र उससे वही बात दुहराते । उनकी बातें सुनकर वह बच्ची सिर्फ उनकी तरफ़ कुतूहल भरी निगाहों से देखती, मानो नेत्रों से ही वार्तालाप कर रही हो । और कुछ दिनों में उनकी वैसी बातें सुनकर बच्ची किनारे से हटकर बिस्तर के बीच में चली जाने लगी। वह बच्ची कभी भी बिस्तर से नहीं गिरी । वह माता-पिता को देखकर ही बिस्तर के बीच में चली जाया करती। काफी बाद में तो वह बिस्तर का किनारा देखकर ही बीच में चली जाती । इस सब की शुरुआत करते समय हमारे मित्र को वैज्ञानिक पैवलव का प्रयोग और सिद्धांत शायद ही याद रहा हो । ऐसे ही एक दिन अपनी बच्ची को सीढ़ियों से उतरने की कोशिश करते देखकर मेरे मित्र को उसे सीढ़ियों पर चढ़ने-उतरने का सही तरीका सिखाने का विचार आया था।
इस बच्ची के पिता ने जितनी सूझ-समझ, संयम और दूरदर्शिता का परिचय दिया, वैसी ही अपेक्षा साहित्यकारों से करना समाज का अधिकार है। साहित्यकार या रचनाकार अन्य व्यक्तियों से भिन्न होता है, केवल बौद्धिक क्षमता में ही नहीं, अपनी बोध चेतना में भी! वह शब्दों का चितेरा होता है। एक उदाहरण लीजिए। संगीत में सात शुद्ध स्वर हैं, चार कोमल और एक तीव्र, यानी कुल मिलाकर बारह तरह के स्वर होते हैं। इनके तीन सप्तक माने जा सकते हैं। लेकिन संगीत की मात्र इतनी मूल सामग्री से चार सौ से भी अधिक राग बनाये गये हैं, और उनमें से प्रत्येक राग में सैकड़ों धुनें निकाली जा सकती हैं। विश्व में जितनी भी धुनें हैं वे इन्हीं बारह मूल स्वरों के भिन्न-भिन्न संयोगों के परिणाम हैं, प्रत्येक धुन अपनी एक अलग पहचान और स्थान रखती है।... इस बात को हम यदि साहित्यिक सृजन पर लागू करें तो कहा जा सकता है कि संगीत में जो स्थान स्वरों का है वही भाषा में शब्दों का, और इस दृष्टि से देखें तो जितनी भी साहित्यिक कृतियाँ हैं वे शब्दों के विभिन्न अंतराय संयोगों से मिलकर बनी हुई धुनें हैं जिनका अपना स्वतंत्र संप्रेष्य और मधुरता है। लेकिन यहाँ पर रचनाकार की विलक्षण प्रतिभा या ‘जीनियस’ की चर्चा करना जरूरी है। ‘जीनियस’ शब्द की एक अर्थ-छटा सृजन-क्षमता की ओर भी संकेत करती है। सच्चे रचनाकार की खासियत यह है कि वह परंपरा से चले आये शब्दों में संवेदना के स्तर पर नये अप्रत्याशित अर्थ फूंक देता है। शब्द वही होते हैं, लेकिन भावना या बोध के स्तर पर वे एक सर्वथा नवीन व्यंजना की सृष्टि करते हैं, जो जितनी नवीन होती है, बहुधा उतनी ही सार्वजनीन भी होती है— उसे उसी तरह हृदयंगम किया जा सकता है, जैसे उस भाषा में कही गयी किसी भी बात को किया जाता है। धूमिल की रचना का उदाहरण लेते हैं: एक आदमी, रोटी बेलता है,
एक आदमी रोटी खाता है,
एक तीसरा आदमी भी है,
जो न रोटी बेलता है,
न रोटी खाता है
वह सिर्फ रोटी से खेलता है...
यहाँ सीधे सरल वाक्य हैं लेकिन इस वाक्य रचना का परिपाक एक बिलकुल नयी, बल्कि चमत्कारिक व्यंजना में होता है। यहाँ केवल अनुप्रास नहीं है, केवल सरल कुछ रोजमर्रा की बातें नहीं है, इससे बहुत आगे इसमें व्यापक तौर पर समाज में फैली आर्थिक कुप्रथाओं का बिम्ब देखने को मिलता है जो मानव-सभ्यता और उसके मूल्य-बोध पर एक कलंक है। ‘रोटी से खेलना’ मानव की भावनाओं से खेलने का ही एक प्रतीक है। सच्चे रचनाकार में इस तरह की एक मौलिकता होती है जो दामिनी की तरह साधारण अर्थगत परिदृश्य में एक आकस्मिक कौंध पैदा कर देती है। सृजनधर्मी लोग और पाठक-श्रोता इस कौंध को देखकर विस्मित और आनंदित होते हैं, साथ ही वे एक सृजनरत हृदय से प्रकट सार्वजनीन सत्य की व्यापकता का भी साक्षात्कार करते हैं, और ऐसा अनुभव करते हैं कि कवि या लेखक ने उस सार्वजनीन सत्य को उद्घाटित करने के लिए ही वह रचना विशेष रची थी। परंतु रचनाकार कोई रचना क्यों करता है, यह तो वही बता सकता है।
समाज में, रचनाशील समाज में भी कई प्रकार के व्यक्ति (और संस्थाएँ) संचालित होते रहते हैं। शुद्ध रचनाधर्मिता के अलावा रचनाकारों में अलग-अलग प्रकार की चेतनाएँ देखी जाती हैं जो उन्हें क्रियाशील रखती हैं। इनमें स्वांत: सुखाय, स्वाध्याय, वाग्विलास, यश-कीर्ति, प्रतिष्ठा एवं पुरस्कार से लेकर धनोपार्जन तक कई उद्देश्य हो सकते हैं, और समाज में इन सभी उद्देश्यों को किसी न किसी रूप में बने रहने का लोकसम्मत अधिकार प्राप्त है। लेकिन मजे की बात यह है कि इन सभी घटकों से विशिष्ट या साधारण पाठक-श्रोता की जो आस बंधी होती है वह एक ही होती है – व्यापक सरोकारयुक्त तरोताज़गी भरा मनोरंजन। केवल तथ्यों का दुहराव-तिहराव नहीं, केवल सूचनापरकता की बोझिलता नहीं, केवल यथार्थ का मलीदा नहीं बल्कि आनंद-विभोर करनेवाली हृदय हिलोर, जो हममें सत्य का शक्ति-संचार करे, हमारे जीवन को श्रेष्ठ लक्ष्य की ओर उन्मुख करे ! इससे कम में हो सकता है पाठक-श्रोता मान भी जाये, लेकिन ऐसे में वह केवल काम चला रहा होता है, वैसे ही जैसे किसी परदेस में जब हमें खाने के लिए कुछ ढंग का नहीं मिलता तो हम चना-मूंगफली या संतरा खाकर अपने को बहला लेते हैं कि हमारे पेट में कुछ जा रहा है! हमें यह भी नहीं भूलना है प्रत्येक रचनाकार साथ-साथ एक पाठक-श्रोता भी होता है।
हृदय हिलोर उठाने की मांग को पूरा करना प्रत्येक रचनाकार का सपना होता है, उसे इस बात की चिंता निरंतर सताती रहती है कि वह इस सपने को पूरा होते हुए देखे। लेकिन जब कभी उसे ऐसा लगता है कि वह इस उद्देश्य से काफी दूर रह गया है तो वह कुछ ऐसे उपायों को अपनाने की कोशिशें करने लगता है जिससे वह रचनाप्रसूत आह्लाद नहीं तो कम से कम उस जैसा कुछ – कोई स्थानापन्न – तैयार करने में सफल हो जाये ! इसके लिए बहुत प्रकार के प्रयास किये जाते हैं । यह ऐसा ही होता है जैसे कोई डॉक्टर किसी के केवल लक्षणों को देखकर उसी आधार पर उसका पथ्यापथ्य निश्चित कर दे!
वास्तव में, एक संवेदनाधर्मी रचनाकार की निर्माण प्रक्रिया मानवता का, बल्कि स्वयं प्रकृति का एक विराट और दूरगामी उपक्रम है। जितने आयाम जीवन के हो सकते हैं, उतने ही एक सच्चे रचनाकार की निर्माण प्रक्रिया के भी मानने होंगे। जितना लालायित एक कंजूस अपने अमीर से अमीर होते जाने के लिए होता है और दिन-रात उसके लिए खटता रहता है, उससे कहीं ज्यादा एक रचनाकार को खटना पड़ेगा। एक श्रेष्ठ वैज्ञानिक के, एक कुशल योद्धा के निर्माण में जितनी उत्कट इच्छा शक्ति और लगन अपेक्षित हो सकती है, उससे कुछ अधिक ही रचनाकार के निर्माण में अपेक्षित रहेगी। उसे मानव को एक नया बोध, नया विचार, एक नयी दृष्टि देनी है, जो वर्तमान दृष्टिकोण से काफी सुधरी हुई होगी, समुन्नत होगी। उसे अपने मार्ग के एक-एक पत्थर को देखते समझते हुए चलना है, और जहाँ मार्ग नहीं दिख रहा है वहाँ दिखाना है, जहाँ मार्ग नहीं है वहाँ बनाना है। उसके पास सभ्य मानव के प्रत्येक प्रकार के ज्ञान और अनुभव का निचोड़ चाहिए, ताकि वह मानव की अब तक की प्रगति के साथ अपनी लेखनी में न्याय कर सके। हो सके तो उसे मानव जीवन के प्रत्येक सर्जनात्मक कर्मक्षेत्र से प्रत्यक्षत: गुजरना चाहिए, ताकि भांति भांति के वर्ण्य विषयों को उसकी लेखनी से नि:सृत होनेवाला रचनात्मक विषय बनने के लिए बार-बार उसके ड्राइंग रूम में आ आकर प्रवेश करने की तकलीफ न उठानी पड़े। एक बात यह भी है कि ड्राइंग रूम में तो उसके द्वारा आहूत भाव एवं प्रतीक ही प्रवेश करेंगे, जबकि यदि वह किसी प्राकृतिक कर्मक्षेत्र (यानी जंगल) अथवा किसी मानवीय कर्मक्षेत्र में प्रवेश करेगा तो उसे गेहूँ के साथ साथ घुन भी मिलेगा, सोने के साथ सुहागा भी!
लेकिन यही वह स्थल है जहाँ हममें संकुचित दृष्टिकोण घर कर जाता है और हमें भरमा देता है। जैसे जीवन के अन्य क्षेत्रों में हम शार्टकट या सफलता के फार्मूलों की फिराक में रहते हैं, वैसे ही साहित्य के क्षेत्र में भी हम जल्द से जल्द सफल होने के चक्कर में चकराते पाये जाते हैं। हम भूले बैठे हैं कि हमारा स्थान किंग से भी ऊँचा है, हम तो किंग मेकर की श्रेणी में जाने के लिए मनोनीत किये गये थे, मगर कहीं से कहावत सुन ली कि “गुरु तो गुरु रह गये, चेला शक्कर हो गये” तो हमारा माथा ठनक गया! ऐसा होते ही व्यक्ति -- व्यक्ति-वैचित्र्यवाद का शिकार हो जाता है और साधारणता की भूमि से उसके पैर उखड़ जाते हैं! इसके बाद जो भी होता है उसे भलाई में तो नहीं गिना जा सकता। रचनाकारों को पहले के दिनों से भी कहीं ज्यादा इस बात से सावधान रहने की जरूरत है।
यदि हमें सचमुच स्थायी प्रकृति का कुछ रचना है, कालजयी कहा जा सकनेवाला कुछ करना है तो स्वयं जीवन के पास जाकर उससे कुछ सीखना होगा। इस संदर्भ में कुछ समय पूर्व दिवंगत प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी की बरबस याद आती है। वे ऐसी लेखिका थीं जिन्होंने अपने जीवन और लेखन को मिलाकर इतना एक और अखंड कर दिया कि उनका जीवन ही उनका लेखन बन गया और उनका लेखन ही उनका जीवन। उन्होंने कल्पना के बजाए बाकायदा मौका मुआयना कर करके अपने उपन्यासों के पात्र रचे, उनके जीवन को ऊर्जस्वित किया और फिर उन्हें पूरे आत्मविश्वास से ओत-प्रोत करके संसार मंच के समक्ष रखा। इसी कारण उनके पात्रों में अजब जीवंतता और जुझारूपन है। एक लेखक और उसके वास्तविक पात्रों की अंतरंगता की इससे बड़ी मिसाल कहाँ मिलेगी कि जब महाश्वेता देवी को बिरसा मुंडा के जीवन पर आधारित उपन्यास ’जंगल के दावेदार’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो आदिवासियों ने जगह जगह ढाक बजाकर गाया- “हमें साहित्य अकादमी मिला है।” लेखिका ने मात्र संघर्ष और सहानुभूति भरी पंक्तियाँ नहीं लिखीं बल्कि अन्याय और अत्याचार की मार खा रहे लोगों के बीच जाकर उन्हें अपना निश्छल निर्मल प्रेम दिया और उनसे जीवन के अतुल पराक्रम के सूत्र सीखे! साहित्य जब घोर कर्मठता के बीच से जन्म लेता है तब उसकी अजेयता में कोई संदेह नहीं हो सकता।
जीवन और प्रकृति – जिसने हमें उत्पन्न किया -- उसी के पास सारे रहस्यों की कुंजी है। हमारे संदर्भ में – हमारी प्रकृति का अधिकांश मानवीयता के उदात्त तत्व का बना हुआ है। इसे ही हमें समझना होगा, और सरल शब्दों में इसका अर्थ है – अपने आप को समझना। हमें पूरी नम्रता से इस बात को स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम स्वयं को ठीक से जान नहीं पाये हैं। जाहिर है कि ऐसे में दूसरों के साथ हमारे मौलिक संबंध, बल्कि ऐक्य को भी हम नहीं समझ पाये हैं। यदि ऐसा न होता तो हम हाल ही निराश न हो जाते, हाल ही खुशी से उछले न पड़ते, अपनी हार अथवा गिरावट को नकारते नहीं, आये दिन तनाव और अवसाद के नखरे न उठाते होते, अपने आसपास चारों तरफ भूख और अशिक्षा का जो बेओर-छोर समुद्र आलोढ़ित हो रहा है, उसकी उपेक्षा करके अपने को उससे अनछुआ और कटा न रखते, और अंतिम लेकिन असमाप्त बात -- अपनी रचनाओं में भूख और अशिक्षा के उस समुद्र की बेतहाशा बेसहारा तरंगों को कच्चे माल की तरह अपनी रचनाओं में इस्तेमाल करने की धृष्टता तो नहीं ही दिखाते।...जो भी हो, हमें अपने आप से ही शुरुआत करनी है – यदि हमें दूसरों पर काम करना हो – तब भी। बिना खुद को समझे दूसरों को समझने का कोई मतलब ही नहीं होता।
मुझे बनाना है एक मनुष्य
दो हाथ दो पैर वाला मनुष्य
हममें से ही लेकर एक मनुष्य
अनायास झंझटों से मुक्त एक मनुष्य
विषयुक्त सोच से हट के एक मनुष्य
प्रदूषित राजनीति से पृथक एक मनुष्य
आत्म चेतना से युक्त एक मनुष्य
संवेदना से संपृक्त एक मनुष्य
तन, मन, चेतन संयुक्त एक मनुष्य
इस अद्भुत प्रयोगशाला में बनेगा एक मनुष्य
जिसमें सबसे पहले मैं बनूंगा एक मनुष्य ।
शिक्षा के उद्देश्य को लेकर कई तरह की बातें कहने-सुनने में आती हैं। शिक्षा को वास्तव में शिक्षा होने के लिए व्यापक मानवीय हित से चेतन रूप से संबद्ध करना होगा। इस कसौटी पर शिक्षा आज भी पूरी तरह खरी नहीं उतरती। पहले शिक्षा में सूचनाओं का, ‘इन्फर्मेशन’ का बोलबाला था। इसमें भी अब टेक्नोलॉजी घुस गयी है । इन्फर्मेशन टेक्नोलॉजी ने हर जगह अपनी पकड़ बना ली है। अब, जब एक-आध क्लिक से राह चलते ही मोबाइल इंटरनेट के जरिये कोई भी सूचना हासिल की जा सकती है, जाहिर है इन्फर्मेशन को दिमाग में कचड़े के तरह भरने की जो होड़ लगी हुई है वह बेकार है । आज की परिस्थितियों में सूचना संग्रह से कहीं ज्यादा जरूरत उसके उपयोग कौशल की है। दूसरे महत्व की बात समय प्रबंधन की है। तीसरी और सबसे महत्व की बात यह है कि सूचना का अंतिम उपयोग किस परिप्रेक्ष्य में किया जायेगा। यह सब तभी सधेगा जब हम जानकारियों को समता के साथ अनुभव और ग्रहण करनेवाला संकल्पनाशील चित्त विकसित कर सकें। इसके लिए हमें सही अर्थों में एक स्वस्थ मानव विकसित करना होगा। चाइल्ड इज़ द फादर ऑफ मैन – इस सूक्ति के अनुसार हमें अच्छे मानव के लिए अच्छा चाइल्ड विकसित करना होगा। यह तभी हो सकता है जब हम स्वयं को विकसित करें, दूसरे शब्दों में यह वर्तमान को विकसित करना है। स्वयं का परिष्कार ही वर्तमान के सुधार का पहला निर्णायक पायदान है जो भविष्य में दिखायी देगा। क्या वह सूखा पत्ता ही दोषी है जो बेजान होकर खड़क रहा है? अनेक कारणों से देश का जनमानस भटका हुआ है। या तो वह विपन्नता से ग्रस्त होकर अपने वजूद की तलाश में खर्च हुआ जा रहा है, या फिर रूढ़िवादिता अथवा पारंपरिक विश्वासों की जकड़न में फंसा है, या फिर राजनीतिक-सामाजिक पैंतरेबाजी में मसरूफ है, या फिर किसी मनगढ़ंत आत्मश्लाघा या खुशफहमी में है।... ऊपर से समाचार-मीडिया को जो करना चाहिए उससे वह बिलकुल विमुख है। जितने गैर-जिम्मेदाराना तरीके से आज पत्रकारिता की जा रही है वह सचमुच शोचनीय है। ऐसे में बीमार समाज को कुछ ऐसा देना, जो कुछ दूर तक उनका मार्ग प्रशस्त कर सके, उसमें परिस्थितियों का सामना करने का जज़्बा पैदा कर सके - इसके लिए बहुत विशाल हृदय होने – सहस्रधार होकर बहने की जरूरत है। विशाल हृदय की पहली विशेषता यह होती है कि वह दूसरों में जड़ता और यांत्रिकता होने के प्रमाण नहीं गिनाता बल्कि अपने ही भाव-बाणों को घिसकर तेज करता रहता है।
हमारी पत्रिका यही उद्देश्य लेकर चली है। जब एक बालिका अपने बचपन के नैसर्गिक स्वभाव को भोग रही होती है तो हम उसे अपनी पसंद का कोई भी परिधान पहना सकते हैं । परंतु जब वह धीरे-धीरे अपनी उम्र के पड़ाव पार करती जाती है तो उससे कोई कार्य करवाना कठिन होता जाता है। ठीक उसी प्रकार एक पत्रिका जब अपने बाल्यकाल में होती है, अपने स्वभाव को गढ़ रही होती है तो उसे अपनी मनपसंद और अपने बंधु-बांधवों की कहा-कही की रचनाएं शामिल करना अच्छा लगता है, कई व्यावहारिक कारणों से यह आवश्यक भी होता है। छोटी बालिका रंगबिरंगी पोशाक पहनकर शृंगार करके अपने जनों से पूछती है कि मैं कैसी लग रही हूं? कोई नई पत्रिका भी शुरू-शुरू में यह जानना चाहती है कि वह जंच रही है या नहीं; और प्रतिक्रियानुसार वह अपने आपको संशोधित करते हुए आगे बढ़ती है। लेकिन बड़ी हुई बालिका अपने स्वरूप में आने के बाद इस तरह के प्रश्नों से बचने की कोशिश करते हुए चलती है। उसमें अपने गुण-धर्म को स्वयं एक महत्ता प्रदान करने की शक्ति आ जाती है । क्या करना और कहना उसके लिए अच्छा है उसे भान हो जाता है । जब एक पत्रिका भी अपना स्वरूप ग्रहण कर लेती है तो उसमें उसके अनुरूप ही रचनाएँ शामिल करने का आग्रह आ जाता है। ऐसे में उन बंधुओं को कुछ असहजता महसूस हो सकती है जो शुरुआत में साथ चलने के आमंत्रण को यह सोचकर नज़रअंदाज कर गये कि यह हमारे ही साथ चलनेवाली पत्रिका है, भला हमें क्या दे सकती है ।
शायर ने कहा था कि काफिलों के बसते बसते हिंदोस्तान बन गया था। यह बात कितनी सही है यह तो इतिहासवेत्ताओं का विषय है। पर जहाँ तक मरुतृण पत्रिका की बात है, काफिलों को बसते हुए देखना सचमुच सुखद है। जैसे कोई हवाई जहाज उड़ान भरने के बाद हवा में इधर-उधर झुक-झुकाकर हवा में एक गतिमय स्थिरता प्राप्त कर लेता है और अपने गंतव्य की ओर जाता है, कमोबेश वैसी ही स्थिति पत्रिका भी प्राप्त करने में उद्यत है।
अब की परिस्थितियों में तो यही लगता है कि वैज्ञानिकता के एक नये आलोक में प्रवेश करता हुआ युग उस साहित्य की ओर भी उन्मुख हो और कुछ कदम बढ़ाये जिसे हम चिकित्सकीय या मनोचिकित्सकीय साहित्य कहकर अभिहित कर सकें। चित्रकला और संगीतकला ने तो व्यवस्थित रूप से इस ओर अपने कदम बढ़ा ही दिये हैं, शायद अब समय आ गया है कि रंगमंच और साहित्य भी धीरे-धीरे इस ओर अपना पद-संचार शुरू करें! यानी ऐसा हो सकता है कि भविष्य में किसी व्याधियुक्त मनुष्य को स्वस्थ करने के लिए किसी विशेष श्रेणी के भावों से युक्त कविता अथवा कहानी की रचना की जाये जो उसकी अवस्था में सकारात्मक बदलाव करे।... विकसित होने के साथ ही दुनिया बहुत छोटी भी होती जा रही है। हम सबका प्रभाव विस्तार एक-दूसरे से टकरा रहा है। ऐसे में दो संभावनाएँ हैं। या तो हम अपने विस्तार को अपने ही भीतर समेटने की कोई कला विकसित करें। लेकिन ऐसा करना अप्राकृतिक है, क्रमविकास(इवॉल्यूशन) के विपरीत है और इसलिए ग्राह्य नहीं है। दूसरा उपाय यह है कि प्रभाव का विस्तार इस तरह हो कि विस्तार जितना ज्यादा हो उतना ही सुनम होता जाये, वैकल्पिक होता जाये, वातावरण से समरस होता जाये। यदि ऐसा न हुआ तो विस्तार के प्रवाह एक दूसरे में हस्तक्षेप के रूप में देखे जायेंगे, एक-दूसरे में उलझेंगे, घायल और चोटिल होंगे। बलशाली शासक होंगे और शीलबली शासित होंगे। यह समष्टि विरोधी तो है ही, मानव-धर्म की भी विरोधी दिशा है।... जब भीषण बाढ़ आती है तब सब अपने अपने को सहेजने लगते हैं। इंसान सांप से डरना भूल जाता है और सांप काटना भूल जाता है। वे अपने अपने स्वभाव में बने रहते हैं लेकिन उनका सह-अस्तित्व एक दूसरे ही मुकाम पर पहुँच जाता है। संसार को शायद ऐसी ही किसी प्रेम की बाढ़ की जरूरत हो जिसमें हम, हम रहते हुए भी दूसरे को निर्विकार भाव से स्वीकार करें। हम अस्तित्व के मूल भाव को समझें।...
जब कंप्यूटर वायरसों का चारागाह बन जाता है तब एक दिन हारकर हम उसे फॉरमैट कर देते हैं। तब वह फिर से नया हो जाता है। देखना है कि हमारा दिमाग ऐसा ही कोई वायरसों का चारागाह तो नहीं बन गया है? यदि हाँ, तो क्या इसे फॉरमैट करने का कोई तरीका हो सकता है? जिसमें हमारी अच्छी-बुरी सभी धारणाएँ मानो नि:शेष हो जायें और केवल सत्य-अस्तित्व यथारूप अनुभव हो? खाना पकानेवाले बर्तन-भांडे को इस्तेमाल के बाद अच्छी तरह घिसा जाता है ताकि जो खाना उसमें पकाया गया था उसका लेशमात्र भी उसमें लगा न रह जाये। हालांकि उसमें जो लगा रह जाता है वह खाने का ही अवशिष्ट होता है न कि कोई विष, फिर भी उसे पदार्थ-रहित कर दिया जाता है। बर्तन केवल बर्तन रह जाता है। बर्तन-भांडे के साथ हम यह सब करते हैं लेकिन मन तो एक ऐसा भांडा है जिसमें हम एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी तरकारी बनाते चले जाते हैं। शुचिता का हमें ध्यान ही नहीं रहता। यह दायित्व धर्म को दिया गया था, पर उसे भी लगभग बहिष्कृत कर दिया गया है। जिस तरह भांडे को खाद्य की गंध तक से रहित करके रखा जाता है, उसी तरह खुद को कुछ देर अच्छी-बुरी धारणाओं से रहित करके अंतर्मन की गहरी सच्चाई का अनुभव करना कैसा रहेगा? इस प्रक्रिया को किसी विचारधारा विशेष से न जोड़ा जाये, अपितु यह तो हर तरह के आग्रहों से ऊपर उठने का बेहतरीन उपाय है।
जीवन के प्रत्येक पहलू में वैज्ञानिकता का समावेश करने के घोर हिमायती हम लोग मन के संदर्भ में सरासर अवैज्ञानिकता का परिचय आखिर किसलिए दे रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि विज्ञान का ‘साबू’ जीवन के तमाम पहलुओं का उद्धार करने के बाद अब वापस लौटकर हमारे सामने खड़ा है, मानो अब केवल हमारा ही उद्धार होना बाकी रह गया है? हम सचमुच वही मानव हैं क्या जिसके विषय में बड़े बड़े दावे किये गये थे? स्वर्ग के देवताओं को भी जिसका स्वागत करने के लिए भेजने की बात सोची गयी थी? यदि हम वही महिमान्वित मानव हैं, तब तो हम विज्ञान को पूरी सहमति से अपने स्वयं साथ भी वही करने देंगे जो हमने उसके सहयोग से पूरी सृष्टि के साथ किया है ! यदि हम इसमें झिझक रहे हैं तो कहीं न कहीं हमने विज्ञान की मूल प्रकृति को समझने में भूल की है। विज्ञान तो निष्पक्ष होता है, फिर विज्ञान को अपने भीतर कार्य करने देने में हमें भला क्या आपत्ति होनी चाहिए? विज्ञान तो हमारी ही आत्मा का आविष्कार रहा है? तो आज जब वह हमारी आँखों में आँखें डालकर हमसे कुछ पूछ रहा है तो हम बगलें कैसे झांक सकते हैं? इससे हमारी उस नीयत पर भी सवाल उठते हैं जो संसार को जीतने की हमारी महत्वाकांक्षा के पीछे काम कर रही थी।
विज्ञान तो हमसे जवाब लेगा ही, बेहतर होगा कि हम स्वयं ही उसे सत्य का अनुसंधान कर लेने दें। यदि वह वास्तव में विज्ञान है तो वह हमारे आह-उह की कोई परवाह नहीं करेगा और हमारे दोषों को ऐसे हमारे सामने धर देगा जैसे कोई शल्य चिकित्सक हमारे किसी खराब अंग को हमसे काटकर हमारे सामने रखकर दिखाता है !
आइये! सामना करें अपने सच का।
वास्तव में, एक संवेदनाधर्मी रचनाकार की निर्माण प्रक्रिया मानवता का, बल्कि स्वयं प्रकृति का एक विराट और दूरगामी उपक्रम है। जितने आयाम जीवन के हो सकते हैं, उतने ही एक सच्चे रचनाकार की निर्माण प्रक्रिया के भी मानने होंगे। जितना लालायित एक कंजूस अपने अमीर से अमीर होते जाने के लिए होता है और दिन-रात उसके लिए खटता रहता है, उससे कहीं ज्यादा एक रचनाकार को खटना पड़ेगा। एक श्रेष्ठ वैज्ञानिक के, एक कुशल योद्धा के निर्माण में जितनी उत्कट इच्छा शक्ति और लगन अपेक्षित हो सकती है, उससे कुछ अधिक ही रचनाकार के निर्माण में अपेक्षित रहेगी। उसे मानव को एक नया बोध, नया विचार, एक नयी दृष्टि देनी है, जो वर्तमान दृष्टिकोण से काफी सुधरी हुई होगी, समुन्नत होगी। उसे अपने मार्ग के एक-एक पत्थर को देखते समझते हुए चलना है, और जहाँ मार्ग नहीं दिख रहा है वहाँ दिखाना है, जहाँ मार्ग नहीं है वहाँ बनाना है। उसके पास सभ्य मानव के प्रत्येक प्रकार के ज्ञान और अनुभव का निचोड़ चाहिए, ताकि वह मानव की अब तक की प्रगति के साथ अपनी लेखनी में न्याय कर सके। हो सके तो उसे मानव जीवन के प्रत्येक सर्जनात्मक कर्मक्षेत्र से प्रत्यक्षत: गुजरना चाहिए, ताकि भांति भांति के वर्ण्य विषयों को उसकी लेखनी से नि:सृत होनेवाला रचनात्मक विषय बनने के लिए बार-बार उसके ड्राइंग रूम में आ आकर प्रवेश करने की तकलीफ न उठानी पड़े। एक बात यह भी है कि ड्राइंग रूम में तो उसके द्वारा आहूत भाव एवं प्रतीक ही प्रवेश करेंगे, जबकि यदि वह किसी प्राकृतिक कर्मक्षेत्र (यानी जंगल) अथवा किसी मानवीय कर्मक्षेत्र में प्रवेश करेगा तो उसे गेहूँ के साथ साथ घुन भी मिलेगा, सोने के साथ सुहागा भी!
लेकिन यही वह स्थल है जहाँ हममें संकुचित दृष्टिकोण घर कर जाता है और हमें भरमा देता है। जैसे जीवन के अन्य क्षेत्रों में हम शार्टकट या सफलता के फार्मूलों की फिराक में रहते हैं, वैसे ही साहित्य के क्षेत्र में भी हम जल्द से जल्द सफल होने के चक्कर में चकराते पाये जाते हैं। हम भूले बैठे हैं कि हमारा स्थान किंग से भी ऊँचा है, हम तो किंग मेकर की श्रेणी में जाने के लिए मनोनीत किये गये थे, मगर कहीं से कहावत सुन ली कि “गुरु तो गुरु रह गये, चेला शक्कर हो गये” तो हमारा माथा ठनक गया! ऐसा होते ही व्यक्ति -- व्यक्ति-वैचित्र्यवाद का शिकार हो जाता है और साधारणता की भूमि से उसके पैर उखड़ जाते हैं! इसके बाद जो भी होता है उसे भलाई में तो नहीं गिना जा सकता। रचनाकारों को पहले के दिनों से भी कहीं ज्यादा इस बात से सावधान रहने की जरूरत है।
यदि हमें सचमुच स्थायी प्रकृति का कुछ रचना है, कालजयी कहा जा सकनेवाला कुछ करना है तो स्वयं जीवन के पास जाकर उससे कुछ सीखना होगा। इस संदर्भ में कुछ समय पूर्व दिवंगत प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी की बरबस याद आती है। वे ऐसी लेखिका थीं जिन्होंने अपने जीवन और लेखन को मिलाकर इतना एक और अखंड कर दिया कि उनका जीवन ही उनका लेखन बन गया और उनका लेखन ही उनका जीवन। उन्होंने कल्पना के बजाए बाकायदा मौका मुआयना कर करके अपने उपन्यासों के पात्र रचे, उनके जीवन को ऊर्जस्वित किया और फिर उन्हें पूरे आत्मविश्वास से ओत-प्रोत करके संसार मंच के समक्ष रखा। इसी कारण उनके पात्रों में अजब जीवंतता और जुझारूपन है। एक लेखक और उसके वास्तविक पात्रों की अंतरंगता की इससे बड़ी मिसाल कहाँ मिलेगी कि जब महाश्वेता देवी को बिरसा मुंडा के जीवन पर आधारित उपन्यास ’जंगल के दावेदार’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो आदिवासियों ने जगह जगह ढाक बजाकर गाया- “हमें साहित्य अकादमी मिला है।” लेखिका ने मात्र संघर्ष और सहानुभूति भरी पंक्तियाँ नहीं लिखीं बल्कि अन्याय और अत्याचार की मार खा रहे लोगों के बीच जाकर उन्हें अपना निश्छल निर्मल प्रेम दिया और उनसे जीवन के अतुल पराक्रम के सूत्र सीखे! साहित्य जब घोर कर्मठता के बीच से जन्म लेता है तब उसकी अजेयता में कोई संदेह नहीं हो सकता।
जीवन और प्रकृति – जिसने हमें उत्पन्न किया -- उसी के पास सारे रहस्यों की कुंजी है। हमारे संदर्भ में – हमारी प्रकृति का अधिकांश मानवीयता के उदात्त तत्व का बना हुआ है। इसे ही हमें समझना होगा, और सरल शब्दों में इसका अर्थ है – अपने आप को समझना। हमें पूरी नम्रता से इस बात को स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम स्वयं को ठीक से जान नहीं पाये हैं। जाहिर है कि ऐसे में दूसरों के साथ हमारे मौलिक संबंध, बल्कि ऐक्य को भी हम नहीं समझ पाये हैं। यदि ऐसा न होता तो हम हाल ही निराश न हो जाते, हाल ही खुशी से उछले न पड़ते, अपनी हार अथवा गिरावट को नकारते नहीं, आये दिन तनाव और अवसाद के नखरे न उठाते होते, अपने आसपास चारों तरफ भूख और अशिक्षा का जो बेओर-छोर समुद्र आलोढ़ित हो रहा है, उसकी उपेक्षा करके अपने को उससे अनछुआ और कटा न रखते, और अंतिम लेकिन असमाप्त बात -- अपनी रचनाओं में भूख और अशिक्षा के उस समुद्र की बेतहाशा बेसहारा तरंगों को कच्चे माल की तरह अपनी रचनाओं में इस्तेमाल करने की धृष्टता तो नहीं ही दिखाते।...जो भी हो, हमें अपने आप से ही शुरुआत करनी है – यदि हमें दूसरों पर काम करना हो – तब भी। बिना खुद को समझे दूसरों को समझने का कोई मतलब ही नहीं होता।
मुझे बनाना है एक मनुष्य
दो हाथ दो पैर वाला मनुष्य
हममें से ही लेकर एक मनुष्य
अनायास झंझटों से मुक्त एक मनुष्य
विषयुक्त सोच से हट के एक मनुष्य
प्रदूषित राजनीति से पृथक एक मनुष्य
आत्म चेतना से युक्त एक मनुष्य
संवेदना से संपृक्त एक मनुष्य
तन, मन, चेतन संयुक्त एक मनुष्य
इस अद्भुत प्रयोगशाला में बनेगा एक मनुष्य
जिसमें सबसे पहले मैं बनूंगा एक मनुष्य ।
शिक्षा के उद्देश्य को लेकर कई तरह की बातें कहने-सुनने में आती हैं। शिक्षा को वास्तव में शिक्षा होने के लिए व्यापक मानवीय हित से चेतन रूप से संबद्ध करना होगा। इस कसौटी पर शिक्षा आज भी पूरी तरह खरी नहीं उतरती। पहले शिक्षा में सूचनाओं का, ‘इन्फर्मेशन’ का बोलबाला था। इसमें भी अब टेक्नोलॉजी घुस गयी है । इन्फर्मेशन टेक्नोलॉजी ने हर जगह अपनी पकड़ बना ली है। अब, जब एक-आध क्लिक से राह चलते ही मोबाइल इंटरनेट के जरिये कोई भी सूचना हासिल की जा सकती है, जाहिर है इन्फर्मेशन को दिमाग में कचड़े के तरह भरने की जो होड़ लगी हुई है वह बेकार है । आज की परिस्थितियों में सूचना संग्रह से कहीं ज्यादा जरूरत उसके उपयोग कौशल की है। दूसरे महत्व की बात समय प्रबंधन की है। तीसरी और सबसे महत्व की बात यह है कि सूचना का अंतिम उपयोग किस परिप्रेक्ष्य में किया जायेगा। यह सब तभी सधेगा जब हम जानकारियों को समता के साथ अनुभव और ग्रहण करनेवाला संकल्पनाशील चित्त विकसित कर सकें। इसके लिए हमें सही अर्थों में एक स्वस्थ मानव विकसित करना होगा। चाइल्ड इज़ द फादर ऑफ मैन – इस सूक्ति के अनुसार हमें अच्छे मानव के लिए अच्छा चाइल्ड विकसित करना होगा। यह तभी हो सकता है जब हम स्वयं को विकसित करें, दूसरे शब्दों में यह वर्तमान को विकसित करना है। स्वयं का परिष्कार ही वर्तमान के सुधार का पहला निर्णायक पायदान है जो भविष्य में दिखायी देगा। क्या वह सूखा पत्ता ही दोषी है जो बेजान होकर खड़क रहा है? अनेक कारणों से देश का जनमानस भटका हुआ है। या तो वह विपन्नता से ग्रस्त होकर अपने वजूद की तलाश में खर्च हुआ जा रहा है, या फिर रूढ़िवादिता अथवा पारंपरिक विश्वासों की जकड़न में फंसा है, या फिर राजनीतिक-सामाजिक पैंतरेबाजी में मसरूफ है, या फिर किसी मनगढ़ंत आत्मश्लाघा या खुशफहमी में है।... ऊपर से समाचार-मीडिया को जो करना चाहिए उससे वह बिलकुल विमुख है। जितने गैर-जिम्मेदाराना तरीके से आज पत्रकारिता की जा रही है वह सचमुच शोचनीय है। ऐसे में बीमार समाज को कुछ ऐसा देना, जो कुछ दूर तक उनका मार्ग प्रशस्त कर सके, उसमें परिस्थितियों का सामना करने का जज़्बा पैदा कर सके - इसके लिए बहुत विशाल हृदय होने – सहस्रधार होकर बहने की जरूरत है। विशाल हृदय की पहली विशेषता यह होती है कि वह दूसरों में जड़ता और यांत्रिकता होने के प्रमाण नहीं गिनाता बल्कि अपने ही भाव-बाणों को घिसकर तेज करता रहता है।
हमारी पत्रिका यही उद्देश्य लेकर चली है। जब एक बालिका अपने बचपन के नैसर्गिक स्वभाव को भोग रही होती है तो हम उसे अपनी पसंद का कोई भी परिधान पहना सकते हैं । परंतु जब वह धीरे-धीरे अपनी उम्र के पड़ाव पार करती जाती है तो उससे कोई कार्य करवाना कठिन होता जाता है। ठीक उसी प्रकार एक पत्रिका जब अपने बाल्यकाल में होती है, अपने स्वभाव को गढ़ रही होती है तो उसे अपनी मनपसंद और अपने बंधु-बांधवों की कहा-कही की रचनाएं शामिल करना अच्छा लगता है, कई व्यावहारिक कारणों से यह आवश्यक भी होता है। छोटी बालिका रंगबिरंगी पोशाक पहनकर शृंगार करके अपने जनों से पूछती है कि मैं कैसी लग रही हूं? कोई नई पत्रिका भी शुरू-शुरू में यह जानना चाहती है कि वह जंच रही है या नहीं; और प्रतिक्रियानुसार वह अपने आपको संशोधित करते हुए आगे बढ़ती है। लेकिन बड़ी हुई बालिका अपने स्वरूप में आने के बाद इस तरह के प्रश्नों से बचने की कोशिश करते हुए चलती है। उसमें अपने गुण-धर्म को स्वयं एक महत्ता प्रदान करने की शक्ति आ जाती है । क्या करना और कहना उसके लिए अच्छा है उसे भान हो जाता है । जब एक पत्रिका भी अपना स्वरूप ग्रहण कर लेती है तो उसमें उसके अनुरूप ही रचनाएँ शामिल करने का आग्रह आ जाता है। ऐसे में उन बंधुओं को कुछ असहजता महसूस हो सकती है जो शुरुआत में साथ चलने के आमंत्रण को यह सोचकर नज़रअंदाज कर गये कि यह हमारे ही साथ चलनेवाली पत्रिका है, भला हमें क्या दे सकती है ।
शायर ने कहा था कि काफिलों के बसते बसते हिंदोस्तान बन गया था। यह बात कितनी सही है यह तो इतिहासवेत्ताओं का विषय है। पर जहाँ तक मरुतृण पत्रिका की बात है, काफिलों को बसते हुए देखना सचमुच सुखद है। जैसे कोई हवाई जहाज उड़ान भरने के बाद हवा में इधर-उधर झुक-झुकाकर हवा में एक गतिमय स्थिरता प्राप्त कर लेता है और अपने गंतव्य की ओर जाता है, कमोबेश वैसी ही स्थिति पत्रिका भी प्राप्त करने में उद्यत है।
अब की परिस्थितियों में तो यही लगता है कि वैज्ञानिकता के एक नये आलोक में प्रवेश करता हुआ युग उस साहित्य की ओर भी उन्मुख हो और कुछ कदम बढ़ाये जिसे हम चिकित्सकीय या मनोचिकित्सकीय साहित्य कहकर अभिहित कर सकें। चित्रकला और संगीतकला ने तो व्यवस्थित रूप से इस ओर अपने कदम बढ़ा ही दिये हैं, शायद अब समय आ गया है कि रंगमंच और साहित्य भी धीरे-धीरे इस ओर अपना पद-संचार शुरू करें! यानी ऐसा हो सकता है कि भविष्य में किसी व्याधियुक्त मनुष्य को स्वस्थ करने के लिए किसी विशेष श्रेणी के भावों से युक्त कविता अथवा कहानी की रचना की जाये जो उसकी अवस्था में सकारात्मक बदलाव करे।... विकसित होने के साथ ही दुनिया बहुत छोटी भी होती जा रही है। हम सबका प्रभाव विस्तार एक-दूसरे से टकरा रहा है। ऐसे में दो संभावनाएँ हैं। या तो हम अपने विस्तार को अपने ही भीतर समेटने की कोई कला विकसित करें। लेकिन ऐसा करना अप्राकृतिक है, क्रमविकास(इवॉल्यूशन) के विपरीत है और इसलिए ग्राह्य नहीं है। दूसरा उपाय यह है कि प्रभाव का विस्तार इस तरह हो कि विस्तार जितना ज्यादा हो उतना ही सुनम होता जाये, वैकल्पिक होता जाये, वातावरण से समरस होता जाये। यदि ऐसा न हुआ तो विस्तार के प्रवाह एक दूसरे में हस्तक्षेप के रूप में देखे जायेंगे, एक-दूसरे में उलझेंगे, घायल और चोटिल होंगे। बलशाली शासक होंगे और शीलबली शासित होंगे। यह समष्टि विरोधी तो है ही, मानव-धर्म की भी विरोधी दिशा है।... जब भीषण बाढ़ आती है तब सब अपने अपने को सहेजने लगते हैं। इंसान सांप से डरना भूल जाता है और सांप काटना भूल जाता है। वे अपने अपने स्वभाव में बने रहते हैं लेकिन उनका सह-अस्तित्व एक दूसरे ही मुकाम पर पहुँच जाता है। संसार को शायद ऐसी ही किसी प्रेम की बाढ़ की जरूरत हो जिसमें हम, हम रहते हुए भी दूसरे को निर्विकार भाव से स्वीकार करें। हम अस्तित्व के मूल भाव को समझें।...
जब कंप्यूटर वायरसों का चारागाह बन जाता है तब एक दिन हारकर हम उसे फॉरमैट कर देते हैं। तब वह फिर से नया हो जाता है। देखना है कि हमारा दिमाग ऐसा ही कोई वायरसों का चारागाह तो नहीं बन गया है? यदि हाँ, तो क्या इसे फॉरमैट करने का कोई तरीका हो सकता है? जिसमें हमारी अच्छी-बुरी सभी धारणाएँ मानो नि:शेष हो जायें और केवल सत्य-अस्तित्व यथारूप अनुभव हो? खाना पकानेवाले बर्तन-भांडे को इस्तेमाल के बाद अच्छी तरह घिसा जाता है ताकि जो खाना उसमें पकाया गया था उसका लेशमात्र भी उसमें लगा न रह जाये। हालांकि उसमें जो लगा रह जाता है वह खाने का ही अवशिष्ट होता है न कि कोई विष, फिर भी उसे पदार्थ-रहित कर दिया जाता है। बर्तन केवल बर्तन रह जाता है। बर्तन-भांडे के साथ हम यह सब करते हैं लेकिन मन तो एक ऐसा भांडा है जिसमें हम एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी तरकारी बनाते चले जाते हैं। शुचिता का हमें ध्यान ही नहीं रहता। यह दायित्व धर्म को दिया गया था, पर उसे भी लगभग बहिष्कृत कर दिया गया है। जिस तरह भांडे को खाद्य की गंध तक से रहित करके रखा जाता है, उसी तरह खुद को कुछ देर अच्छी-बुरी धारणाओं से रहित करके अंतर्मन की गहरी सच्चाई का अनुभव करना कैसा रहेगा? इस प्रक्रिया को किसी विचारधारा विशेष से न जोड़ा जाये, अपितु यह तो हर तरह के आग्रहों से ऊपर उठने का बेहतरीन उपाय है।
जीवन के प्रत्येक पहलू में वैज्ञानिकता का समावेश करने के घोर हिमायती हम लोग मन के संदर्भ में सरासर अवैज्ञानिकता का परिचय आखिर किसलिए दे रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि विज्ञान का ‘साबू’ जीवन के तमाम पहलुओं का उद्धार करने के बाद अब वापस लौटकर हमारे सामने खड़ा है, मानो अब केवल हमारा ही उद्धार होना बाकी रह गया है? हम सचमुच वही मानव हैं क्या जिसके विषय में बड़े बड़े दावे किये गये थे? स्वर्ग के देवताओं को भी जिसका स्वागत करने के लिए भेजने की बात सोची गयी थी? यदि हम वही महिमान्वित मानव हैं, तब तो हम विज्ञान को पूरी सहमति से अपने स्वयं साथ भी वही करने देंगे जो हमने उसके सहयोग से पूरी सृष्टि के साथ किया है ! यदि हम इसमें झिझक रहे हैं तो कहीं न कहीं हमने विज्ञान की मूल प्रकृति को समझने में भूल की है। विज्ञान तो निष्पक्ष होता है, फिर विज्ञान को अपने भीतर कार्य करने देने में हमें भला क्या आपत्ति होनी चाहिए? विज्ञान तो हमारी ही आत्मा का आविष्कार रहा है? तो आज जब वह हमारी आँखों में आँखें डालकर हमसे कुछ पूछ रहा है तो हम बगलें कैसे झांक सकते हैं? इससे हमारी उस नीयत पर भी सवाल उठते हैं जो संसार को जीतने की हमारी महत्वाकांक्षा के पीछे काम कर रही थी।
विज्ञान तो हमसे जवाब लेगा ही, बेहतर होगा कि हम स्वयं ही उसे सत्य का अनुसंधान कर लेने दें। यदि वह वास्तव में विज्ञान है तो वह हमारे आह-उह की कोई परवाह नहीं करेगा और हमारे दोषों को ऐसे हमारे सामने धर देगा जैसे कोई शल्य चिकित्सक हमारे किसी खराब अंग को हमसे काटकर हमारे सामने रखकर दिखाता है !
आइये! सामना करें अपने सच का।
-संपादक मंडल,
मरुतृण साहित्य-पत्रिका






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