चिंतन का विषय

क्या हम सही दिशा में सोच रहे हैं?

मरुतृण

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क्या हम सही दिशा में सोच रहे हैं?

Sunday, 20 January 2019

क्या हम सही दिशा में सोच रहे हैं?

चिंतन का विषय

- शुरू शुरू में जब समझदारी एक नयी-नयी चीज़ की तरह दिखायी देती थी, तब मैंने जीवन का एक कामचलाऊ प्रारूप बना लिया था, जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त औसतों से बना एक खाका था। आजकल के रंग-ढंग की शिक्षा ने मन में यह बात अच्छी तरह से बैठा दी थी कि जीवन में किसी भी तरफ बहुत आगे जाने के भाव को ज्यादा भाव नहीं देना है! एक सीमा के बाद प्रत्येक विचार में, गतिविधि में, क्रिया में जोखिम का क्षेत्र शुरू होने लगता है। इसलिए साहस में, श्रेष्ठता में, यहाँ तक कि अच्छाई में भी बहुत बेबाक होना समझदारी में नहीं आता – ऐसी मेरी धारणा बन गई थी। और इस प्रकार की धारणा जिन लोगों में होती है, वे समाज से एक तरह का सूक्ष्म भय खाते हैं, जिसका अक्सर उन्हें पता नहीं रहता। मैं भी इसका अपवाद नहीं था – इन संदर्भों में समाज मेरे गुरु समान था – संकल्पना के रूप में! समाज का यह गुरुत्व उसमें निहित किसी स्वयंचेतन-तत्व का परिणाम नहीं था, उस अर्थ में जिस अर्थ में ज्ञान की आत्मनिर्भरता को माना जाता है। मान लिया गया था कि समाज में स्वाभाविक रूप से इस प्रकार की एक ऐहिक क्षमता विद्यमान रहती है, और जिसे मान लेना ही श्रेयस्कर होता है। सो मान लिया गया था। बहुत बाद में पता चला कि जिसे एक स्वाभाविक ज्ञान के रूप में मान्यता प्रदान कर दी गई थी, उसी मान्यता के रास्ते अज्ञान को भी, बल्कि प्रधानत: उसको ही मानस में प्रवेश मिल रहा था। बहुत बाद में यह खोज हो पायी और तब तक अज्ञान काफी उठा-पटक करने में कामयाब भी हो चुका था।

जब यह सब रहस्य उद्घाटित हो ही गया तो मानस की छानबीन करके देखा गया कि गड़बड़ हो कहाँ रही है? तब पिछले आग्रहरहित चिंतनों के पुण्यों के प्रबल प्रताप से चीज़ें पहले से कुछ अधिक स्पष्ट रूप में अनुभव में आयीं। सबसे पहले तो यह समझ में आया कि यह जो समाज में एक स्वाभाविक चेतन तत्व-- जो स्वायत्तता की दृष्टि से व्यक्तित्व न भी हो तो व्यक्तित्व का स्थानापन्न हो, समतुल्य हो—मान लिया गया था जो कि समाज की तथाकथित अंतर्निहित संरचना के फलस्वरूप प्रकट हो उठता है – इसी, ठीक इसी मान्यता में गफलत थी। व्यक्तित्व के चरित्र को समझने में भूल हो रही थी। औसतों के मेल-मिलाप से कभी भी चेतन व्यक्तित्व तो क्या, उसके जैसा, उसका शंताश, सहस्रांश भी स्वरूप ग्रहण नहीं कर सकता, जबकि ऐसी किसी अभिकल्पित चेतन सत्ता को मान्यता दे दी गयी थी। समाज कितना भी बड़ा हो, विशाल हो, सूचनाओं और भावनाओं का आगार हो, लेकिन वह एक व्यक्तित्व, एक चेतन सत्ता का स्थानापन्न नहीं हो सकता – कभी नहीं हो सकता। यह एक बहुत बड़े आविष्कार के रूप में चित्त-पटल पर अंकित हो गया।

वास्तव में तभी समझ आया कि जड़वादी होने का क्या अर्थ है? जड़ में से चेतन नि:सृत होता है, इस प्रकार की धारणाओं को जड़वादी चिंतन का उत्स मानना चाहिए। जैसा पहले कहा, चूंकि समाज देश-काल-निमित्त के विस्तार में भांति-भांति की बौद्धिक प्रवृत्तियों का एक गतिमय संग्रहालय है, संस्कारराशि है, मानवीय अनुभवों का स्मृतिकोष है – इसलिए वह चेतन है या चेतना को उद्दीप्त कर सकता है—यह मान लिया गया था – और ठीक यहीं पर भूल थी, अज्ञान था! ऐसा कभी नहीं हो सकता। समाज कितना भी विशाल आगार हो – वह कभी भी स्वयंचेतन नहीं हो सकता, चेतना को प्रकट नहीं कर सकता, उसके विश्लेषण के परिणाम कभी भी औसतों के चंगुल से परे नहीं हो सकते, ना ही वे कोई सर्वथा नवीन उद्भावना को उत्तोलित कर सकते हैं। वैज्ञानिक आईंस्टीन के शब्दों में कहें तो समाज को ‘बोध’ नहीं हो सकता। चेतन अनुभूति, उसका प्रकटना, उसकी परिकल्पना करना तो दूर, समाज उसका स्वप्न भी नहीं ले सकता। इन सभी व्यापारों के लिए एक व्यक्तित्व, चेतन व्यक्तित्व का होना आवश्यक है, जो समाज को – उसके विशाल होने, अनुभवों का उपादान होने को चेतन रूप से अनुभव कराये। एक जगह स्वामी विवेकानन्द ने बड़ा रोचक उदाहरण दिया है। उनके कहने का भाव यह है कि रेल का इंजन भभक रहा है, ताकत से आगे बढ़ने के लिए तैयार है, सीटी दे रहा है, और उसके सामने एक कीड़ा पटरी पर बैठा मानो उसे ललकार रहा है, उसकी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह कर रहा है!

संस्कृत में कर्ता की परिभाषा की गयी- स्वतंत्र: कर्ता! इस कर्ता के अर्थ में समाज को कभी भी नहीं लिया जा सकता। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि समाज अपने अस्तित्व, अपनी परिकल्पना तक के लिए भी किसी व्यक्तित्व पर परावलंबित है – चाहे वह व्यक्तित्व छोटा हो या बड़ा। जैसे कोई कार बिना चाबी के चलना शुरू भी नहीं कर सकती, ऐसे ही चेतन व्यक्तित्व के स्पर्श के बिना समाज के किसी भी पुर्जे में हरकत नहीं आ सकती।

यह भूल कोई छोटी भूल नहीं थी। अत: इसका प्रायश्चित भी छोटा-मोटा नहीं किया जा सकता था। सोचा तो लगा कि गलती से वही कर रहे थे जो स्वामीजी ने कहा था – बैलों के आगे गाड़ी जोतना! समाज को प्रेरक मानना और व्यक्ति को प्रेरित! समाज व्यक्ति को निस्संदेह प्रेरित कर सकता है, लेकिन तभी जब व्यक्ति में प्रेरित होने की स्फुरणा बीज-रूप में पहले से विद्यमान हो। ऐसा नहीं हो सकता कि समाज-रूपी कोई स्वतंत्र चेतना व्यक्तियों में प्रवेश कर जाये और उन्हें उद्दीप्त कर दे। यह व्याख्या सही नहीं हो सकती। बारिश खूब जोरों से हो सकती है, लेकिन यदि धरती की मिट्टी में बीज न हों तो धरती हरी-भरी नहीं होगी। समाज अपनी समग्र स्थितियों के साथ अनुकूल या प्रतिकूल हो सकता है, लेकिन कर्तारूप से प्रेरक नहीं हो सकता। कई बार पहले भी मैंने लिखा है कि लंबे समय से, बल्कि कई पीढ़ियों से दमित दलित चले आ रहे लोग एकाएक क्रांति कर बैठते हैं और समाज व्यवस्था बदल जाती है। यदि समाज में कर्तास्वरूप प्रेरक शक्ति विद्यमान हो तो ऐसा कैसे हो सकेगा, क्योंकि इसका अर्थ होगा कि उस जगह व्यक्ति समाज की प्रेरणा के विरुद्ध गये और अपना उद्धार किया! यहाँ केवल अनुचित शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है, बल्कि क्रांतिकारी सामाजिक प्रक्रिया को भी गलत ढंग से लिया जा रहा है। समाज को ज्यादा से ज्यादा एक प्रभावकारी तत्व के रूप में, वातावरण के रूप में लिया जा सकता है। इसके साथ यह भी मानना पड़ेगा कि कोई व्यक्ति इस प्रभाव को किस सीमा तक अपने में आने देगा, अपने को प्रभावित होने देगा यह व्यक्ति पर ही निर्भर करेगा। यदि ऐसा न होता तो सरदार भगत सिंह जैसे व्यक्ति समाज में कैसे अस्तित्व में आते? समाज को नीचे बहकर आती हुई नदी के रूप में देखा जाये तो हम मानेंगे कि मछलियाँ उसके बहाव के साथ नीचे की ओर आयेंगी। लेकिन सालोमन जैसी मछलियाँ भी होंगी जो धारा के विरुद्ध तैरेंगी और ऊँचे से ऊँचे स्थानों पर अपने अंडे देंगी! यदि नीचे बहकर आना प्रकृति है तो ऊर्ध्व गमन करना भी प्रकृति ही है, न कि कुछ और! हमें यह देखना है कि हम प्रकृति को किस तरह से लेते हैं। इसीलिए मुझे लगता है कि प्रकृति को समझनेवाला व्यक्ति में निहित है, प्रकृति स्वयं को समझाती हुई हममें प्रवेश नहीं करती। हमारी दृष्टि ही उसे समझती है, चाहे सही, चाहे गलत। समाज के साथ भी यही है।

हमारी किसी भी समझ के लिए प्रकृति को कोई दोष नहीं लगता। हमें सर्दी लग रही है, ठिठुर रहे हैं, इसके लिए प्रकृति दोषी नहीं है। इसी तरह हम गर्मी में झुलस रहे हैं, जल रहे हैं, प्रकृति निर्दोष है। हम वसंत में आनंद मना रहे हैं, यह हमारी अपनी बात है। मौसम कोई भी हो, कुआं खोदनेवाला कुआं खोद रहा है, मुनीम हिसाब कर रहा है, खिलाड़ी अपनी वर्ज़िश कर रहा है, विद्यार्थी पढ़ रहा है। जब वे अपने काम से फुर्सत पाते हैं तब मौसम पर ध्यान देते हैं। हाँ, यदि प्रकृति शरीर के रहने की स्थितियों को ही बदल दे, जीवन ही असंभव हो जाये, तब की बात अलग है। लेकिन वह स्थिति हमेशा की स्थिति नहीं है और उस समय जीवन का महत्व भी अभी की भांति नहीं है। टाइटैनिक में अच्छे लोग सवार थे या बुरे, बच्चे सवार थे या युवा या बूढ़े, इसका कोई महत्व नहीं रह जाता। उस स्थिति में जीवन का प्रतिमान ही बदल गया। अत: कायदे से देखा जाये तो वहाँ भी प्रकृति को कोई दोष नहीं लगता। अत: कहने का तात्पर्य यह है कि प्रकृति और हम यानी जीव, मानो दो गोलार्द्ध हैं। दोनों के मेल से जीवन बना है। केवल हम हों इससे जीवन की शर्त पूरी नहीं होती, इसमें संदेह है कि ऐसा हो भी सकता है या नहीं। दूसरी ओर, केवल प्रकृति हो, उसे देखने-ग्रहण करनेवाला व्यक्ति न हो, तो प्रकृति का भी अर्थ नहीं के बराबर हुआ। अत: जीव और प्रकृति के मेल को जीवन कहना चाहिए। मृत्यु यानी जीव और प्रकृति का विच्छेद -– उस प्रकृति का विच्छेद जो सहज ही हमारे जानने पहचानने में आती है।

प्रकृति अपनी राह चलती है, हम भी अपनी राह चलते हैं। हम प्रकृति में समा नहीं सकते, प्रकृति भी हममें समा नहीं सकती। हम प्रकृति को पूर्णरूपेण आवृत्त नहीं कर सकते, प्रकृति भी हमें पूर्णरूपेण आवृत्त नहीं कर सकती। प्रकृति हमारे चारों ओर है, सब ओर से व्याप्त है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है, अथवा यह अनिवार्य नहीं है कि हम अपने को प्रकृति से सराबोर कर लें। हम सटीक तरह से ऐसा कर भी नहीं सकते। हम कितना भी प्रकृतिवादी हो जायें, हममें अपना कुछ स्वत्व रहेगा ही। हम गर्मियों में गर्मी मनायेंगे, सर्दियों में सर्दी। प्रकृति परिवर्तनशील है, हमें भी परिवर्तनशील होना चाहिए – यही शोभनीय है। जड़ता न हमारे लिए ठीक है, न प्रकृति के लिए। हमें प्रकृति के उस रूप का प्रेक्षण करना चाहिए जो उसका वर्तमान रूप है। लेकिन यह साधारण जीवन की बात है। इन रूपों को दरकिनार करके हम प्रकृति के गहरे स्वरूपों में भी उतर सकते हैं, लेकिन इसके लिए हमें प्रकृति के सहज ग्राह्य रूप को परे करना होगा – तभी हम ऐसा कर सकेंगे। जो प्रकृति और उसके उपादान साधारण रूप से हमें उपलब्ध होते हैं, उतने में ही प्रकृति सीमित नहीं है, दूरबीन से, सूक्ष्मदर्शी से देखने पर दूसरे क्षेत्र भी प्रत्यक्ष होंगे, लेकिन उसके लिए साधारण परिदृश्य को छोड़ देना पड़ेगा। हम प्रकृति के किस और कितने सूक्ष्म अंश पर सक्रिय होंगे -– यह व्यक्ति के रूप में हम पर निर्भर करेगा। हमारे लिए यह बिलकुल भी जरूरी नहीं कि जो आसानी से, सहजता से दिख रहा है उतना ही देखें, क्योंकि यही हमारी रचनात्मकता या जीवन की सीमा नहीं है। इस सीमा का अतिक्रमण किया जा सकता है। किस सीमा तक अतिक्रमण किया जा सकता है? यह तय नहीं है... कहना चाहिए आकाश ही सीमा है, और यह सौभाग्य की बात है। केवल अभ्यास की बात है। मानव जाति ने यह अतिक्रमण अनगिनत बार किया है, और हम सभी यह अच्छी तरह जानते हैं। प्रकृति कहीं भी हमें रोकती नहीं है, हमें रुकना भी नहीं चाहिए। हाँ, किसी राह पर चलने की जो शर्तें हैं, उन्हें समझते हुए चलना होगा। आणविक शक्ति का अनुसंधान करते करते वैज्ञानिकों को एक दिन सफलता मिल ही गयी, हाँ, पदार्थ की शर्तों का पालन जरूर करना पड़ा। 
(क्रमश: अगले ब्लॉग में जारी...)

- अमरदीप कुलश्रेष्ठ


मुख्य प्रबंधक ,राज भाषा, युको बैंक, जोरहाट, आसाम


amardeepkulshresth@gmail.com


Wednesday, 9 January 2019

कहाँ बसती है साहित्यकार की आत्मा

सवाल जितना पुराना है, उतना ही विवादास्पद भी। जब से लिखना शुरू किया था और जब से लिखनेवालों के बारे में दार्शनिक मान्यताओं से वास्ता पड़ने लग गया था, तब से यह एक सवाल बार-बार मन में आता था- साहित्यकार की आत्मा कहाँ बसती है? यह बात एक तरह की गांधीगीरी से निकली थी, गांधीजी ने कहा जो है कि भारत गांवों में बसता है। हम तो ठहरे फितूरमिज़ाज, खुद पर ही सवाल दाग दिया – एक लेखक या साहित्यकार कहाँ बसता है, उसकी आत्मा कहाँ बसती है!

जिस सवाल पर हम अक्सर निर्णय पर पहुँच नहीं पाते या किसी उपलब्धि के शिकार नहीं हो पाते, उस सवाल पर जानलेवा हमला कर बैठते हैं, उसे ज़मींदोज़ करना हमारा कांटे का सपना बन जाता है। लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ भी करना टेढ़ी खीर है। आत्मा तो अजर अमर अविनाशी है, उस पर जानलेवा हमला करना या उसे ज़मींदोज़ करना तो बड़ा हास्यास्पद हो जायेगा। चाहता तो मैं भी किसी कट्टर वस्तुवादी की तरह आत्मा के अस्तित्व को बिलकुल सफाचट करते हुए इस सवाल को – कि साहित्यकार की आत्मा कहाँ बसती है- एकदम खारिज कर सकता था। पर कठिनाई यह है कि दार्शनिक मान्यताओं के मामले में मेरे मन में अपनी नादानी के दिनों से ही बड़ी श्रद्धा है, उनके मामले में मैं अपनी कुल जमा पूँजी दांव पर लगाकर ही हरकत में आता हूँ। दार्शनिक अर्थ वाली आत्मा भले न होती हो लेकिन साहित्यिक मामलों में आत्मा का एक पूर्णत: लौकिक अर्थ भी है, और उस अर्थ में इस सवाल को रखने से भी सवाल के वजन में कोई घटाव नहीं दिखता।

आखिर कहाँ बसती है साहित्यकार की आत्मा! सवाल इसलिए भी जटिल है कि साहित्यकारों की बहुत-सी श्रेणियाँ दिखाई देती हैं। दूसरे, बिलकुल विशुद्ध साहित्यकार – तुलसी, रहीम, मीरा वाली श्रेणी के – आजकल दिखाई नहीं देते। इसलिए पहले साहित्यकार का अर्थ निश्चय करना पड़ेगा, प्रश्न के एक धड़े को पकड़ लेना पड़ेगा।

साहित्यकारों का श्रेणीकरण कैसे किया जाए। इस विषय में मुझ नादान ने देशों के श्रेणीकरण का फार्मूला तय किया था। वो मेरी जवानी के दिन थे और मुझे लगा था कि आदमी और देश लगभग एक जैसे होते हैं... बहरहाल, आप थोड़ा हंस लीजिए और मेरी इस मान्यता को सुनिए – मैंने देशों की तर्ज़ पर साहित्यकारों के तीन-चार वर्ग किए – विकसित, अर्ध-विकसित या विकासशील, और पिछड़े हुए साहित्यकार। शुरू-शुरू में किसी सवाल को देखकर घबड़ाहट होती है, पर सही युक्ति काम में ले ली जाए तो सब कुछ बिलकुल साफ हो जाता है। एक उपन्यास में पढ़ा था कि महारथी कर्ण ने एक कंटीली भूमि के टुकड़े को अपनी विशाल सेना सहित पार करने के लिए एक युक्ति निकाली। बड़ी संख्या में युद्ध में काम आने वाले हाथियों को मदिरा पिलाकर मदमस्त कर दिया गया और युद्ध का कोलाहल संगीत मचाकर हाथियों को कंटीले जंगल की ओर खड़ा कर दिया गया। हाथीगण स्वयं घायल और चोटिल अवश्य हुए, लेकिन उन्होंने कंटीला जंगल पार करके ही दम लिया या मार्ग में ही ढेर हो गए। जाहिर है उस समय पशु अधिकार जैसी कोई अवधारणा नहीं थी।... मैंने भी देशों के साथ आदमियों की तुलना की और उससे साहित्यकारों के वर्गीकरण का कंटकाकीर्ण मार्ग स्वच्छ कर लिया, इसमें कितनी संख्या में मदमस्त हाथी घायल आदि-इत्यादि हुए, कितनी गहराई तक चिरे, यह एक अलहदा विषय है।

तो मेरे आँखिन देखे साहित्यकारों की तीन श्रेणियाँ हैं – विकसित, विकासशील और पिछड़े। यह सब केवल साहित्यिकता के आधार पर नहीं है। साहित्य का तो केवल टोकन भर है, असल बात तो सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, समूह-मनोविज्ञानपरक (जिसे सरल शब्दों में भीड़ तंत्र भी कहते हैं और जो वास्तव में कोई तंत्र नहीं वरन तंत्रहीनता का ही एक ससम्मान नामकरण है) आदि के पक्षों-प्रतिपक्षों पर टिकी हुई है। सब मिलाकर स्थिति एक तरह के बाजार तंत्र जैसी है। और यह बाजार निर्गुणवादी कवि कबीर वाला बाजार नहीं है। इस बाजार में समता को छोड़कर सब कुछ है। चंचलता के मामले में पारंपरिक रूप से महालक्ष्मी को सर्वाधिकार मिला हुआ था। लेकिन आज की स्थिति में साहित्यकारों और उनकी कारगुजारियों की मान्यता का मसला चंचलता में और आगे ही बैठेगा। लक्ष्मीजी को किसी का भाग्य पलटने में एक अरसा लगता था, लेकिन साहित्यकार की मान्यता के स्थापित या विस्थापित होने में आजकल उतना समय पर्याप्त है जिसमें सेंसेक्स उठता है और गिर जाता है। एक सभा अपने समवेत कृत्य, या सभा जितना ही वजन रखनेवाला कोई सभापति अपने एक दृष्टि-क्षेप से क्या कर सकता है, यह मेरे कहने-सुनने पर आश्रित नहीं है, सुधीजन जानते ही हैं।

मुझे लगता है, साहित्यकारों की अद्यतन स्थिति के विषय में इतना विवरण काफी होना चाहिए। यदि नहीं तो कोई बात नहीं, अपने स्वयं के साहित्यकार होने में विश्वास रखनेवाले आदमी मुझ विकासशील साहित्यकार से उसके घर के पते पर संपर्क कर सकते हैं।... अब बात आती है साहित्यकार की आत्मा की! मैं उस श्रेणी के साहित्यकार के विचार-सागर से समृद्ध हुआ हूँ, उसका ऋणी हूँ जिसमें संकोच एक श्रेष्ठ गुण होता है जो और गुणों को, साहित्यिक गुणों को खींचकर लाता है। आजकल इस गुण की क्या स्थिति है, इसका अंतिम रूप से निर्णय करने में मुझे अभी कुछ और समय लगेगा। लेकिन यह मेरा विषय नहीं है। मेरा कथ्य यह है कि आत्मा पर बात करने में संस्कारवश अपने को बड़ा सलज्ज अनुभव करता हूँ, वैसे ही जैसे किसी नयी नयी दुल्हन के साथ होता है। आत्मा की बात करते ही जैसे सब कुछ गुम्म हो जाता है!

मैंने पढ़ा है कि एक समय था जब मानव को ही सारे प्राकृतिक क्रमविकास का केन्द्र माना गया था, नामकरण ही हुआ था – मानववाद। इस वाद का बड़ी शिद्दत से स्वागत हुआ था और उस समय के लोग बड़ी गर्मजोशी के साथ इसके गुणानुवाद और कर्मानुवाद में लग गये थे। लेकिन इतिहास बताता है कि मानववाद हमेशा अजेय नहीं रहा। वह लड़खड़ा गया और दूसरे वाद – यथार्थवाद, प्रकृतिवाद, अस्तित्ववाद आदि उस पर पैर रखते हुए बढ़ गये! लेकिन मेरा सवाल यह है कि क्या आत्मवाद के बारे में भी ऐसा कहा जा सकता है? पहली बात तो ऐसा वाद अब तक आया नहीं, लेकिन मेरा कहना यह है कि आत्मा लौकिक अर्थ में भी, सार-तत्व के अर्थ में, किसी वस्तु के कुल-के-कुल प्रयोजनीय अर्थ में भी पूरी तरह व्यावहारिक बैठती है। मानववाद का मुंह की खाना मानव के प्रयोजनीय सार-तत्व के रूप में आत्मा की प्रासंगिकता को कुंद नहीं करता बल्कि इस संभावना की ओर इंगित करता है कि मानव के वर्तमान प्रयत्न पूरे नहीं पड़े हैं और उसके जीवन की व्यक्तिगत और सामूहिक सार्थकता के लिए अभी काफी कुछ सोचा जाना और किया जाना शेष है...

मतलब यह कि मानव की वर्तमान समझ को पर्याप्त मान लेना ठीक नहीं है। कुछ और चीज़ों का संपादित होना रह गया है। वर्तमान मानव से सहित्यकार मानव की दूरी इन्हीं चीज़ों के संपादित होने या न हो पाने के बीच में छिपी हुई है। कहने की बात ही नहीं है कि मैं साहित्यकार को वर्तमान मानव के उन्नत संस्करण के रूप में देख रहा हूँ। वह मानव को उसके भविष्य से जोड़नेवाली, या भविष्य, या कम से कम उसका सपना दिखानेवाली कड़ी है। उसी अर्थ में जिसमें तुलसी और कबीर अपने युग के लिए थे... जब एक साहित्यकार यह समझता है कि यह समय, यह वर्तमान उसे समझ नहीं रहा है, तब वह उस भविष्य पर खड़ा होता है जिसे वह वर्तमान तक खींचकर लाने के लिए अपने को निवेश किए दे रहा है।... वर्तमान का अच्छा मानव देशगत और विश्वगत मानसिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ रहा है, हो सकता है भविष्य का साहित्यकार शिष्टाचार के नये प्रतिमान का फरमान जारी करने की तैयारी में हो!

सहित्यकार की आत्मा मानवता के भविष्य को देख सकने की साहित्यकार की भेदिनी दृष्टि में बसती है। जहाँ वह दृष्टि विश्राम करती है, वहीं बसती है साहित्यकार की आत्मा!            

-अमदीप कुलश्रेष्ठ,
मुख्य प्रबंधक (राजभाषा), 
यूको बैंक, अंचल कार्यालय जोरहाट
amardeepkulshresth@gmail.com     

Tuesday, 8 January 2019

साहित्यकार की सच्चाई मुख्य धारा में कब तक आएगी ?


उपेक्षित प्रश्नों की महासभा

हम साहित्य को जीवन से क्यों नहीं जोड़ पा रहे हैं ? साहित्य क्यों नहीं मार्गदर्शक का काम कर पा रहा है? समाज की जब इतनी सारी समस्याएँ हैं तो उसे हल करने की दिशा में साहित्य क्यों नहीं बढ़ पा रहा है ? क्यों साहित्य के बोझ तले रचित रचनाएँ केवल शोध का विषय बन-बनकर बड़े-बड़े पुस्तकालयों की शोभा बढ़ा रही हैं? क्यों कुछ साहित्यकार यथार्थ का हूबहू चित्रण करने में अपनी कला को समर्पित करने के लिए यह तर्क देते देखे जा रहे हैं कि साहित्यकार कोई समाज सुधारक तो है नहीं कि समाज को सीख देता चले ? अगर यथार्थ के चित्रण को साहित्यकार अपने कर्तव्य की इतिश्री करने का साधन बना लेता है तो क्या यह प्रश्न नहीं उठता कि आम पाठक ऐसा साहित्य क्यों पढ़ें ? यदि साहित्य उसके जीवन की विसंगतियों को सुलझाने का संकेत तक न दे सके तो भला क्यों पढ़ें ऐसे साहित्य ?
ठीक इसके विपरीत भी कहा जा सकता है कि अगर साहित्य में ऐसी प्रभाविता आ जाए कि वह किसी के जीवन की जटिल से जटिल समस्या को सुलझा दे तो कोई ऐसे साहित्य को क्यों नहीं पढ़ेगा ? क्यों वह अंधविश्वास की अंधी गलियों में अपनी उम्मीदों की पोटली लिये अपना सब कुछ लुटा-पिटाकर घूमता फिरेगा? मानसिक गुलाम बनाते पूंजीपति वर्ग के चंगुल में आसानी से फँसने के बजाए कोई साहित्य अगर उससे निकलने का शर्तिया मार्ग दिखाए, दावे के साथ उसकी चुनौतियों का खुलासा करे और उससे निर्णयक लड़ाई की तरकीबें सुझाए, तो क्यों नहीं कोई ऐसा साहित्य पढ़ेगा ? वह समय कब आएगा जब कि साहित्य सीधे मानसिक दासता की बेड़ियों पर चोट करे; उसमें इतनी ताकत हो कि वह उन्हें छिन्न-भिन्न कर दे और मानव को सस्ते बाजारवाद की अक्टोपसी पकड़ से निज़ात दिलाने के लिए उसका मानसिक प्रशिक्षण प्रारंभ करे? मन की जटिलता में वैचारिक प्रदूषण पाल रहे बुद्धिजीवियों को स्वच्छ विचार प्रदान करे; क्या ऐसे साहित्य का सृजन करना संभव नहीं हैं? क्या साहित्य में ऐसी शक्ति लाना संभव नहीं है जिससे कि मानव शरीरधारी कोई  व्यक्ति सड़क के किनारे पड़े भिक्षुक से भिक्षा का पात्र छुड़वाकर उसे कर्म करने पर मजबूर कर दे ? क्या ऐसे साहित्य का
सृजन संभव नहीं है जो नवयुवकों में ऐसी उमंग भर दे कि वे अपनी ऊर्जा को परस्पर संगठित कर कोई ऐसा व्यूह रचने पर अपने को मजबूर पाएँ जो लाखों करोड़ों लोगों की दो वक्त की भौतिक क्षुधा तो शांत करे ही, उनकी आंतरिक ऊर्जा के बाहर आने का रास्ता भी खोले जिससे उनकी सारी नकारात्मक शक्तियाँ उनके आगे नतमस्तक हो जाएँ ?
क्या ऐसा संभव नहीं है कि एक साहित्यकार अपनी अक्षय स्वत:स्फूर्त क्षमता को पहचानकर साधनापूर्वक उसे धारण करे और जो उसे वह ओजस्वी शक्ति प्रदान करे जो वास्तव में एक साहित्यकार के पास होनी चाहिए ?
इसके लिए क्या सबसे पहले उसे अपने साहित्यकार होने के अहं को नहीं त्यागना होगा ? क्या एक कवि या कथाकार रूप में जाने जाने से पहले उसे यह अच्छी तरह ठोक-बजाकर आत्मसात नहीं कर लेना चाहिए कि कवि या कथाकार होना वास्तव में क्या है ? जिस तरह हमारी महिलाएँ मिट्टी के घड़े को बजाकर देखती हैं कि वह कच्चा तो नहीं है, उसी तरह साहित्यकार को अपनी आत्म-परीक्षा नहीं करनी चाहिए? कविता या कहानी (या साहित्य की कोई भी विधा) की मौलिकता क्या है? अब तक क्या-क्या कहा जा चुका है साहित्य में ? और इस समय क्या बचा रह गया है साहित्य में कहने के लिए ? जो पहले कहा जा चुका है उसे फिर से लिखकर दोहराने से क्या लाभ? अगर सचमुच आवश्यकता हो तो क्या उस कहे हुए को पहले के ही नाम से पुन: प्रचारित करना अनिवार्य नहीं है, बजाए इसके कि उन्हीं बातों को नाम मात्र की आभासी नवीनता देकर दोहरा दिया जाए? क्या इस सबके लिए साहित्य के सतत अभ्यास और सत्यनिष्ठा की आवश्यकता नहीं है ? क्या इसकी आवश्यकता नहीं है कि रचनाकार स्वयं अपने जीवन को ही साहित्य में पहले उतार दे और फिर साहित्य रचना करे ? जो करे वही साहित्य में क्यों न उतारे, जो साहित्य रचे उसे ही जीवन में क्यों न उतारे? क्या इस प्रक्रिया से वर्तमान रचनाकार स्वयं लाभान्वित नहीं होंगे ? केवल कविता लिखने के लिए कविता लिखना, केवल कवि बन जाने के लिए कविता लिखना, केवल मंचों पर कविता सुनाने के लिए कविता लिखना, कितना तर्कसंगत है ? क्या यही है एक साहित्यकार की सच्चाई ? क्या यही हैं साहित्य की मुख्य धारा की गतिविधियाँ ? अगर नहीं, तो किस बात का इंतजार है साहित्यकारों को? साहित्य सरिता की धारा को गलत दिशा में मुड़ने से रोक लेने में? सामने कुछ और मन में कुछ और लेकर कब तक हम पाठक को भरमाते रहेंगे और यह समझते रहेंगे कि हमारी इस करतूत को पाठक समझ नहीं रहा है ? हम जो लिख कर दे दे रहे हैं वही पाठक बिना साहित्यकार पर अंगुली उठाए, मान जाएगा - ऐसा भ्रम हमने क्यों पाल रखा है ?
ऐसा करके हम किसे भरमा रहे होते हैं - पाठक को या स्वयं को ? पाठक वर्ग को क्या सब मालूम नहीं है? वह हमारी पीठ पीछे ऐसे साहित्यकारों पर अंगुलियाँ उठा रहे हैं तो इसमें दोष किसका ?
आज हमारे पास सोशल मीडिया जैसा सशक्त हथियार आसानी से हाथ लग गया है, तो क्या हम इसका प्रयोग केवल अपनी निजी तात्कालिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने तक ही सीमित करके रख लेंगे? और भूखे-नंगों के फोटो लेकर पोस्ट करते रहेंगे? केवल लाइक और कमेंट से खुश हो लेंगे? रास्ते में किसी फटेहाल भिखारिन को बच्चों को दूध पिलाते देखा और फिर उसका तस्वीर ले ली और कविता लिख डाली और दे दिए दोनों फेसबुक पर; क्या यह संवेदनाओं को चुराकर अपनी स्वार्थ सिद्धि नहीं हुई? संवेदना चुरा लेने और स्वच्छ रूप से ले लेने में क्या अंतर नहीं है ? अगर वह साहित्य वास्तव में उस गरीब के लिए कुछ भी करनेवाला है तो अवश्य ही वह संवेदना ग्रहण करने का विषय होगा अन्यथा उसे चुराना कहने में क्या हर्ज है ? अगर हमारे पास एक सही और समाज-उपयोगी बात को पल में लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंचा देने की ताकत है, तो उस बात का लाखों करोड़ों लोगों तक पहुँचने लायक सबल होना भी क्या अनिवार्य नहीं है? और क्या सबल रचना के लिए रचनाकार को भी उतना ही सबल होना आवश्यक नहीं है? उसके लिए क्या सबसे पहले यह जरूरी नहीं है कि वह अपनी बातों को फटाफट अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने की लालसा त्यागे और अपनी पूरी ईमानदार शक्ति से ऐसी बातें लोगों में पहुँचाने की तैयारी करे जो कम भले हों पर टिकाऊ हों? क्या एक सशक्त विचार हजारों कमजोर विचारों पर भारी नहीं पड़ेगा?   
प्रश्न यह उठता है कि साहित्यकार बनने से पहले हमें अपने अन्दर के अहं से साक्षात्कार कैसे करना चाहिए? क्योंकि बिना इस द्वारपालसे मिले हम अपने अन्दर बैठे उस विशुद्ध साहित्यकार का साक्षात्कार कैसे कर सकते हैं ? हम जो इस अहं का अपनी अनुशंसा की लालायित तिकड़मबाजी से बेजा पोषण कर रहे हैं, और उससे क्या हो रहा है, इसका हमें कितना अनुमान है ? और जब तक यह अहं हमारे अन्दर के विशुद्ध साहित्यकार के द्वारे खड़ा रहेगा तब तक हम कैसे समाज को प्रभावित करने वाला साहित्य दे सकते हैं, क्योंकि ऐसा साहित्य भी दूसरों के द्वारे खड़े द्वारपाल से जाकर उलझ जाएगा, उसके भीतर अवस्थित निर्मल हृदय तक उसकी पहुँच नहीं बनेगी ? क्या हमें इस महत् कार्य के लिए सच्चे साधक साहित्यकारों के शरणापन्न नहीं होना चाहिए, जिन्होंने अपने जीवन का सर्वस्व लुटाकर भी साहित्य को दमदार बनाया ?
हर कार्य में एक नैसर्गिक सामंजस्य हमें कब दिखाई देगा? कुछ ऐसा करने की जरूरत क्यों नहीं महसूस होती जिसमें हर वर्ग के लोगों को शामिल किया जा सके? बल्कि वर्ग ही न रहे? क्या ऐसा करने के लिए हम किसी विशाल आधार या संसाधनों की तलाश में अपनी जीवन की निधि गँवाते चले जाएँगे?
अगर "वार बिगिन्स इन द माइंड ऑफ द पीपल" हो सकता है तो समाज में बड़े बदलाव का खाका खींचने का काम करने के बजाए साहित्य अपने आप को संकुचित करता हुआ क्यों चल रहा है ? अनोखे समाज के सृजन के लिए आधारभूत साहित्य और संस्कृति का सहारा क्यों नहीं टटोला जा रहा है? ऐसी सोच हमारे मस्तिष्क में क्यों नहीं उत्पन्न हो रही है ? अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो आज एक सजग कहा जानेवाला बुद्धिजीवी सभी राजनेताओं के नाम और कारनामे भले ही जानता है परंतु हमारे लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकारों तक को भी नहीं जानता, जानना भी नहीं चाहता, इस पर साहित्यकार कब विचार करेंगे ?
जितने बड़े पद उतनी बड़ी समस्या ? साहित्यकार खेमों में बँटे हुए क्यों हैं? साहित्य में आन ने न जाने कब अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया ? क्या प्रश्न यह नहीं उठ खड़ा होता कि कार्यक्रम में "आन" से अधिक महत्त्वपूर्ण "आना" होना चाहिए था ? हमारे अहं ने "आना" के अंत से "" को ही समाप्त कर केवल "आन" लगा रखी है और हम अनजान हैं ?
साहित्यकार बनने के लिए बच्चों की तरह निर्मल होने में क्या हमारी बुद्धि बाधा नहीं बन रही है? वह बुद्धि ही किस काम की जो हमारी वास्तविक निर्मलता ही नष्ट कर दे ? अगर बुद्धिमानों की बुद्धि सचमुच बच्चों जैसी स्वच्छ हो जाए तो हमारी वर्तमान बुद्धि के मेल से क्या हम शुद्ध रचनाएँ रचकर बच्चों को नहीं दे पाएँगें ? हमारे अन्दर ऐसी बातों को समझने की शक्ति मौजूद तो है मगर महसूस करने की शक्ति कहाँ चली गई है ? आज समझने और महसूस करने में इतना फर्क कैसे आ गया है ? अगर हम जो समझ रहे हैं वही गहराई से महसूस करने की शक्ति अपने में से जाग्रत कर लें तो हमारी आधी से अधिक, बल्कि सारी समस्याएँ ही समाप्ति की तरफ़ क्या नहीं चल देगीं ?
      यह जो ऊपर से प्रेम का फेन है मगर अन्दर से ईर्ष्या, द्वेष और अहं का काला पानी, क्या यह समाज में भयावह स्थिति पैदा नहीं कर रहा है ? या फिर ऊपर से जमी हुई बर्फ के नीचे कैसी असह्य वेदनादायी शीतल धारा लगातार बह रही है ? आश्चर्य की बात क्या यह नहीं है कि सबको मालूम है कि ईर्ष्याजनित विचार मन में नहीं पैदा होने चाहिए, परंतु फिर भी हम लोग इन्हें किसी पालतू पशु की तरह पालते हैं ?
हो सकता है कि इनको छोड़ देने के उपाय भी मालूम हों, मगर यह सब विचार की सीमा से बाहर कैसे चला गया है? और जिनको मालूम है वे इसे अपनाने की मुद्रा में क्यों नहीं दिख रहे हैं ? बस, ‘सब कुछ चलता हैकी मुद्रा में कैसे आ गया है ? साहित्य, जिसका जन्म ही व्याधियों को समाप्त करने के लिए हुआ था, वह उस लक्ष्य से कोसों दूर कैसे हो गया है ? इसका कारण क्या यह नहीं है कि औषधि जिस वृक्ष से निकल रही है वह वृक्ष स्वयं ही विषैला हो गया है, उसकी जड़ों में विष व्याप्त हो गया है ? दूध में मिलावट और संभावित हानिकारक दवाओं के मिश्रण से बने होने के कारण माताएँ बच्चों को दूध न देना ज़्यादा फ़ायदेमंद कब तक समझती रहेंगी ? लेकिन हम कब तक बिना दूध के बच्चों को पालते रहेंगे ? क्या साहित्य के जनकों के अन्दर विष को समाप्त करने के कुछ उपाय नहीं होंगे जो उन्हें स्वच्छ बनाएँ ?
हम बाहर कहीं से भी अपने लिए कच्चे माल की तरह सामग्री ले लें, मगर क्या हमें उस कच्ची सामग्री को स्वच्छ कर अच्छी तरह पकाने के लिए कुछ उद्योग नहीं करना चाहिए ? इसके लिए चिंतन की आवश्यकता नहीं है क्या ?
क्या हम पूर्व के आदतन चिंतन से रहित हुए बिना कोई भी स्वच्छ और ताज़गी भरा मौलिक विचार कर पाएँगे ? जब तक हम बर्तनस्वच्छ नहीं करते तब तक स्वादिष्ट और तरो-ताज़ा साहित्य का आनन्द लेने-देने की कल्पना भी कैसे कर सकते हैं ? साहित्य जैसे महत्त्वपूर्ण उपादान को हम वर्षों से चले आ रहे ईर्ष्या-अहं ग्रस्त मन में कैसे पकाते चले आ रहे हैं ? संगीत में रियाज़ किया जाता है जिससे मन कर्म वचन सब साफ होते हैं, लेकिन साहित्य में क्या केवल लिखना ही रियाज़ हो सकता है? अपने को रोज़ मनोविकारों से मुक्त करने का भी प्रयास करना जरूरी नहीं है क्या?
आज अधिकतर नये या पुराने साहित्यकारों ने क्षिप्रकारिता’, अर्थात्जल्द से जल्द प्रकाशित और प्रचारित हो जाने की लालसा जैसे गुण पाल रखे हैं, क्या यह उन्हें मालूम भी है ? मूर्धन्य एवं गुरुवर्य साहित्यकारों के अनुरोध कि साहित्य के चसके से बचोपर विचार करने का समय नहीं आ गया है? ‘साहित्य का भूत मत सवार होने दो अपने आप परवाले उपदेश को कोई मानने को क्यों तैयार नहीं है? हम कब तक ऐसे विचारों को सर पर गठरी की भाँति ढोते फिरेंगे कि हमारा साहित्यकारों में नाम हो जाए ,  धाम बन जाए? इतना भर ही रह जाने से साहित्य-प्रेम बंजर धरती पर कहाँ से उपजेगा ? अपने अन्दर के साहित्य की उर्वर धरती को सबसे पहले स्वच्छ करने का उपाय कब किया जाएगा? हम फ़ालतू की इल्लतों से दूर होने का प्रयास करना कब आरंभ करेंगे?
      नवयुवक भी जिम में या कराटे में जाकर कुछ पाने के लिए अभ्यास करने की आवश्यकता महसूस करते हैं तो साहित्यकार बिना प्रशिक्षण के क्यों उतरे जा रहे हैं ?
यह क्यों नहीं समझ आता कि जैसे शारीरिक अभ्यास से धीरे-धीरे सब संभव होने लगता है उसी प्रकार साहित्य के अभ्यास से ही हम में साहित्यिक क्षमता का विकास होगा? यह क्या एक दिन में होगा? क्या यह सब अभ्यास के बिना होगा ? अपने शरीर के विज्ञान को न जाने क्यों और कब हमने कहाँ-कहाँ से जोड़ कर अपने आप को अलग कर लिया ?
हृदय की धड़कन से एक सङ्गीतमय लय नहीं निकलती ? अगर निकलती है तो क्या हमें उस संगीत को सुनने के लिए अपने अंगों पर एकाग्र होने का अभ्यास नहीं करना चाहिए ? शरीर के अन्दर के प्रत्येक अंग आपस में एक ही गति से चल रहें हैं तो क्या वे अनोखा संगीत पैदा नहीं कर रहे हैं ? आरकेस्ट्रा पार्टी में जिस प्रकार समान अन्तराल पर हर प्रकार के यन्त्र बजते हैं और आपस में मिल कर अद्भुत संगीत पैदा करते हैं, वैसे ही क्या हमारे सारे आंतरिक अंग - फेफड़ा, हृदय, उदर, प्लीहा आदि अपने-अपने काम करने के लिए गतिमान होकर संगीत पैदा नहीं कर रहे हैं ? बाहर के आरकेस्ट्रा को सुनने के लिए हमें कान की जरूरत पड़ती है लेकिन क्या सूक्ष्म संगीत को सुनने के लिए हमें कान को ही एक अभ्यास प्रक्रिया से होकर नहीं ले जाना चाहिए? क्या हमें अपने अन्दर के इस भौतिक संगीत को सुनने के अभ्यास नहीं करने चाहिए, ताकि उसे साहित्य में उतारा जा सके? मगर यह बिना अभ्यास के संभव कैसे हो पाएगा? और जबकि यह साहित्यिक यात्रा की केवल भ्रूणीय अवस्था मानी जाएगी।
और अगर ऐसा कुछ नहीं होगा तो साहित्य का क्या होगा ? क्या हम अपने आंतरिक संगीत को सुने बिना ही साहित्य के गीतों में हृदय के गीत समा पाएँगे ? हम केवल अपना भला करने के भ्रमित प्रयास में जुटे रहेंगे तो अपना भला भी कैसे होगा ?
क्या हमें संयम की आवश्यकता नहीं है? अपने विचारों पर संयम की, अपनी प्रतिक्रियाओं पर संयम की ? जिस प्रकार प्रेम-संयम, व्यय-संयम, क्षुधा-संयम, यौन-संयम के बाद अनोखा वरदान प्राप्त होता है उसी प्रकार क्या साहित्य-संयम के बाद हमें ऐसा साहित्य प्राप्त होने की संभावना नहीं है जो लोक-कल्याणकारी, मंगलकारी होने के साथ साथ कालजयी होगा ? क्या यह सदियों से नहीं होता आया है ? साहित्य संयम की स्थिति हासिल करने से पहले क्या हमें स्व-संयम की आवश्यकता नहीं है? हम संयम के बिना महान साहित्य को धारण कर लेंगे ?
दूसरी तरफ़ हमारे आस-पास साहित्य के बरगद के रूप में जो साहित्यकार अपनी छाँव लिए, अपनी विशाल शाखाएँ फैलाए, अपने वास स्थान पर बैठे हैं, उनके सान्निध्य में रहकर उनके जीवन से क्या हमें कुछ लेने की जरूरत नहीं है ?
क्या उनके साहित्य को सबसे पहले दीये की तरह जलाकर अपने अनुष्ठानों में रखना आवश्यक नहीं है ? क्या वे दिन ब दिन नई जड़ें पैदा कर ज़मीन में धंसा नहीं रहे हैं, और जो भी उनके सान्निध्य में आता है, उसे अपनी शीतलता और अपनी गुणवत्ता भी उन्हें बिना बताए ही प्रदान नहीं कर रहे हैं ? तो क्या हमें इनके पास जाने की आवश्यकता नहीं है, अपनी पहचान दूर दूर तक सोशल मीडिया में फैलाने के साथ-साथ ?
इन सारे प्रश्नों के कटघरे में हम सब क्यों असहाय से खड़े हैं ? क्या साहित्यकार की सच्चाई आज मुख्य धारा में है ? यह केवल आम पाठक को ही मालूम है या साहित्यकार-गण भी जानते हैं ? इसकी भयावहता से क्या सभी अवगत नहीं हैं ? हमारे गणमान्य साधक साहित्यकार सब कुछ देख-सुन कर, अपनी जीवन की सारी निधियाँ हमें समर्पित कर इस परिस्थिति की तरफ़ कब तक इस कदर देखते रहेंगे कि अब कोई नया पौधा उगकर दूषित वातावरण को स्वच्छ करने की प्रक्रिया प्रारंभ करे ?

- संपादक मंडल,
मरुतृण साहित्य-पत्रिका

आपकी बात के विषय में : पाठकों से अनुरोध  है कि वे अपनी प्रतिक्रिया मरुतृण में छपी रचानाओं के विषय में दें ताकि रचनाकार अपनी रचना प्रक्रिया में सतत आगे बढ़ते रहे न कि केवल पत्रिका का गुणगान होकर रह जाए । आपकी बातरचनाकार और पाठक के बीच सेतु की तरह कार्य करता है, इस सेतु को संबल देना आप सभी का स्नेहित दायित्व है । अपनी रचना के साथ पत्रिका के किसी  अंक पर अपने संक्षिप्त विचार अवश्य भेजें ताकि यह सेतु कार्यरत रहे । साधारण  पाठक  भी अवश्य अपनी प्रतिक्रिया अपनी साधारण  भाषा में  निःसंकोच  दें ।


Monday, 7 January 2019

हमारे अस्तित्व का चलचित्र

क्या अनचाहा हो रहा है, यह हम सब कह सकते हैं; मनचाहा क्या होना चाहिए, हममें से कम ही लोग कह सकते हैं; यह कैसे होना चाहिए, उससे भी कम लोग कह सकते हैं। और हम क्या कर रहे हैं, यह कहने का माद्दा उससे भी कम लोगों में है । अपनी करनी को कहने का अधिकार तो सबको होना चाहिए, है ही, पर कितने हैं जो सलीके से उसे कहते हैं, कहना चाहते हैं? ऐसा करनेवालों की संख्या सबसे कम है, भले ही उनको सुननेवाले न हों या न के बराबर हों । यही हमारे कर्म का वास्तविक चलचित्र है । किसी ने बड़ी गहरी बात कही है कि हमें सामनेवाले की समझने बूझने की योग्यता और मंशा को आंकना तो जरूर चाहिए, परंतु कभी ऐसी नौबत भी आ सकती है कि हमें अपने द्वारा अनुभूत सत्य को अपनी पूरी वाक्-क्षमता दांव पर रखकर कह देना पड़े, भले ही ऐसा लगे कि सामनेवाला उसे ग्रहण नहीं कर पायेगा। हमें केवल यह देखना चाहिए कि उक्त परिस्थिति में उसे उस सत्य की कितनी जरूरत है। कई बार देखने में आता है कि व्यक्ति को कोई संतोषजनक तार्किक कारण न मिलने पर भी वह सामनेवाले के सशक्त चरित्र और हाव-भाव को देखकर उसकी बात मान लेता है और बाद में वह पाता है कि उसने बात मानकर ठीक किया था। इस अद्भुत सत्य से जीवन में कई बार लोगों का सामना होता है। हमारा अपनी बात को इस डर से न कहना कि उसे कोई मानेगा नहीं, हमारी चुप्पी को सार्थक नहीं बना देता। हमारा किसी मूल्ययुक्त बात पर यथोचित बल देकर कहना, और किसी का उस पर ध्यान न देना – ये दोनों दो स्वतंत्र क्रियाएँ हैं, इन्हें गड्ड-मड्ड नहीं किया जा सकता। यदि किसी बात में सत्य है और उसे उस सत्य की गरिमा के साथ व्यक्त किया गया है तो उसकी सार्थकता उतने में ही हो जाती है। यह सार्थकता उसके ध्यानपूर्वक सुने या माने जाने पर निर्भर नहीं है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि कई बार उपेक्षा की शिकार, लेकिन प्रखरता से कही जाती रही बातों को अपनाकर पुराने पापों का योग्य परिष्कार किया गया है। सामना किया जाता है उस सत्य का जिसकी लंबे समय से अनदेखी की जा रही थी। लेकिन ऐसी बात कही तक न गयी होती तो उसकी उपेक्षा भी नहीं की गयी होती, उसे बाद में अपनाये जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।       
    मान लीजिए किसी सहकर्मी के बच्चे की तबीयत अचानक बिगड़ जाए । स्थानीय डॉक्टरों ने सलाह दी हो कि उसकी तत्काल शल्यचिकित्सा कराई जाए, लेकिन उसके शुभचिंतक घरवाले उससे कहें कि बच्चे को एक बार वेलोर में दिखा लाओ – हो सकता है ऐसी जोख़िम भरी शल्यचिकित्सा न करनी पड़े । दूसरी ओर कुछ सहकर्मी सोच रहे हों कि इतनी दूर ले जाने का संकट उठाना ठीक नहीं, यहीं, इसी शहर में चिकित्सा करवानी चाहिए। लेकिन ऐसी बात कौन समझाए? कौन बीच में पड़े? कोई अनर्थ हुआ तो उसका दोषी कौन बनेगा ? लेकिन अगर कुछ लोग तय कर लें कि सहकर्मी को अपनी पूरी क्षमता और विश्वास से वर्तमान परिस्थितियों की गंभीरता दर्शा दी जाए - बाकी उसकी मर्जी !... ऐसी परिस्थिति में बहुधा ऐसा होता है कि इलाज जल्द से जल्द अपने शहर में ही सही जगह कराया जाता है और बच्चा स्वस्थ भी हो जाता है, जबकि दूर कहीं ले जाने में समय गँवाना जानलेवा हो सकता था । अपनी बात पूरे मन से कह देने से वह सामनेवाले के पास किसी न किसी रूप में पहुँचती है, चाहे सामनेवाला उसे मानने के पक्ष में न भी रहे । सत्य भी अपने आप, पानी की तरह, अपना तल खोज लेता है । असल में होता यह है कि एक सूक्ष्म अहं, अच्छे से अच्छे संयमी मनुष्य के अवचेतन मन में पड़ा रहता है, जिसके कारण हम सामनेवाले की वाजिब बातों को भी एक ही बार में वाजिब नहीं मानना चाहते।
    अवश्य ही ऐसे भाव-व्यापार अवचेतन मन की पृष्ठभूमि में होते हैं और इनमें समय लगता है। यह भी कह सकते हैं कि प्रत्येक संतुलित कार्य में प्रकृति की अपनी कुछ शर्तें, कुछ तौर-तरीके होते हैं जिनके निर्वाह में समय लगता है। लेकिन आजकल ज़िंदगी का तकाज़ा कुछ ऐसा है कि हम एक-दो से ज्यादा प्रयास करने में यकीन नहीं रखते। यदि इतने में सामनेवाले को समझ आ जाये तो ठीक, नहीं तो जय राम जी की! तुम अपने रास्ते और मैं अपने! होना यह चाहिए कि हम अपने दृष्टिकोण को और उदार, और समावेशी बनायें । जो और जैसा हम चाह या सोच रहे हैं, वह और वैसा नहीं भी हो सकता है - इस परिस्थिति के प्रति अभी से ज्यादा संवेदनशील स्वीकारभाव विकसित करें। हमें सोचना चाहिए कि किसी के एक-दो बार कह देने मात्र से कोई अपने विचार कैसे बदल सकता है, खासकर तब, जब हम भी उससे कोई बहुत बेहतर न हों! कोई बात हमें केवल मुंह से नहीं कहनी है, न ही अगले को केवल कानों से सुननी है। हम किसी बात के कहने को उसकी संपूर्ण जिम्मेदारी के विस्तृत फलक पर देखें। ऐसा कर सकने पर हम देखेंगे कि ऐसी बहुत-सी बातें हमें कहने योग्य ही नहीं लगेंगी जिन्हें हम कहने के आदी थे। दूसरी ओर, हम ऐसी कई बातों को अभी से कहीं ज्यादा बढ़ी हुई चेतना और मार्मिकता से करेंगे जिन्हें पहले करते ही नहीं थे या अधर में छोड़ दिया करते थे ।
    कई बार यह भी होता है कि हम सोचते हैं अगला हमें समझ ही नहीं पायेगा, उसमें वैसी क्षमता नहीं है, पर हो सकता है हम गलत हों। अक्सर हमें लगता है कि किसी नन्हे बच्चे को हम कितना भी समझाएँ वह नहीं समझ पायेगा, परंतु समय आने पर वह ऐसा कुछ कर देता है कि हम दंग रह जाते हैं । हमारे एक मित्र की बच्ची जब मात्र छह महीने की थी तो वह खेलते-खेलते बिस्तर के किनारे पर आ जाया करती थी। एक दिन हमारे मित्र अपनी बच्ची को खेल-खेल में तोतली ज़ुबान में बताने लगे, "गुड़िया यहाँ मत आओ गिर जाओगी "। उसके बाद से जब कभी बच्ची किनारे पर आती तो मित्र उससे वही बात दुहराते । उनकी बातें सुनकर वह बच्ची सिर्फ उनकी तरफ़ कुतूहल भरी निगाहों से देखती, मानो नेत्रों से ही वार्तालाप कर रही हो । और कुछ दिनों में उनकी वैसी बातें सुनकर बच्ची किनारे से हटकर बिस्तर के बीच में चली जाने लगी। वह बच्ची कभी भी बिस्तर से नहीं गिरी । वह माता-पिता को देखकर ही बिस्तर के बीच में चली जाया करती। काफी बाद में तो वह बिस्तर का किनारा देखकर ही बीच में चली जाती । इस सब की शुरुआत  करते समय हमारे मित्र को वैज्ञानिक पैवलव का प्रयोग और सिद्धांत शायद ही याद रहा हो । ऐसे ही एक दिन अपनी बच्ची को सीढ़ियों से उतरने की कोशिश करते देखकर मेरे मित्र को उसे सीढ़ियों पर चढ़ने-उतरने का सही तरीका सिखाने का विचार आया था। 
    इस बच्ची के पिता ने जितनी सूझ-समझ, संयम और दूरदर्शिता का परिचय दिया, वैसी ही अपेक्षा साहित्यकारों से करना समाज का अधिकार है। साहित्यकार या रचनाकार अन्य व्यक्तियों से भिन्न होता है, केवल बौद्धिक क्षमता में ही नहीं, अपनी बोध चेतना में भी! वह शब्दों का चितेरा होता है। एक उदाहरण लीजिए। संगीत में सात शुद्ध स्वर हैं, चार कोमल और एक तीव्र, यानी कुल मिलाकर बारह तरह के स्वर होते हैं। इनके तीन सप्तक माने जा सकते हैं। लेकिन संगीत की मात्र इतनी मूल सामग्री से चार सौ से भी अधिक राग बनाये गये हैं, और उनमें से प्रत्येक राग में सैकड़ों धुनें निकाली जा सकती हैं। विश्व में जितनी भी धुनें हैं वे इन्हीं बारह मूल स्वरों के भिन्न-भिन्न संयोगों के परिणाम हैं, प्रत्येक धुन अपनी एक अलग पहचान और स्थान रखती है।... इस बात को हम यदि साहित्यिक सृजन पर लागू करें तो कहा जा सकता है कि संगीत में जो स्थान स्वरों का है वही भाषा में शब्दों का, और इस दृष्टि से देखें तो जितनी भी साहित्यिक कृतियाँ हैं वे शब्दों के विभिन्न अंतराय संयोगों से मिलकर बनी हुई धुनें हैं जिनका अपना स्वतंत्र संप्रेष्य और मधुरता है। लेकिन यहाँ पर रचनाकार की विलक्षण प्रतिभा या ‘जीनियस’ की चर्चा करना जरूरी है। ‘जीनियस’ शब्द की एक अर्थ-छटा सृजन-क्षमता की ओर भी संकेत करती है। सच्चे रचनाकार की खासियत यह है कि वह परंपरा से चले आये शब्दों में संवेदना के स्तर पर नये अप्रत्याशित अर्थ फूंक देता है। शब्द वही होते हैं, लेकिन भावना या बोध के स्तर पर वे एक सर्वथा नवीन व्यंजना की सृष्टि करते हैं, जो जितनी नवीन होती है, बहुधा उतनी ही सार्वजनीन भी होती है— उसे उसी तरह हृदयंगम किया जा सकता है, जैसे उस भाषा में कही गयी किसी भी बात को किया जाता है। धूमिल की रचना का उदाहरण लेते हैं:      एक आदमी, रोटी बेलता है,
एक आदमी रोटी खाता है,
एक तीसरा आदमी भी है,
जो न रोटी बेलता है,
न रोटी खाता है
वह सिर्फ रोटी से खेलता है...
    यहाँ सीधे सरल वाक्य हैं लेकिन इस वाक्य रचना का परिपाक एक बिलकुल नयी, बल्कि चमत्कारिक व्यंजना में होता है। यहाँ केवल अनुप्रास नहीं है, केवल सरल कुछ रोजमर्रा की बातें नहीं है, इससे बहुत आगे इसमें व्यापक तौर पर समाज में फैली आर्थिक कुप्रथाओं का बिम्ब देखने को मिलता है जो मानव-सभ्यता और उसके मूल्य-बोध पर एक कलंक है। ‘रोटी से खेलना’ मानव की भावनाओं से खेलने का ही एक प्रतीक है। सच्चे रचनाकार में इस तरह की एक मौलिकता होती है जो दामिनी की तरह साधारण अर्थगत परिदृश्य में एक आकस्मिक कौंध पैदा कर देती है। सृजनधर्मी लोग और पाठक-श्रोता इस कौंध को देखकर विस्मित और आनंदित होते हैं, साथ ही वे एक सृजनरत हृदय से प्रकट सार्वजनीन सत्य की व्यापकता का भी साक्षात्कार करते हैं, और ऐसा अनुभव करते हैं कि कवि या लेखक ने उस सार्वजनीन सत्य को उद्घाटित करने के लिए ही वह रचना विशेष रची थी। परंतु रचनाकार कोई रचना क्यों करता है, यह तो वही बता सकता है।
    समाज में, रचनाशील समाज में भी कई प्रकार के व्यक्ति (और संस्थाएँ) संचालित होते रहते हैं। शुद्ध रचनाधर्मिता के अलावा रचनाकारों में अलग-अलग प्रकार की चेतनाएँ देखी जाती हैं जो उन्हें क्रियाशील रखती हैं। इनमें स्वांत: सुखाय, स्वाध्याय, वाग्विलास, यश-कीर्ति, प्रतिष्ठा एवं पुरस्कार से लेकर धनोपार्जन तक कई उद्देश्य हो सकते हैं, और समाज में इन सभी उद्देश्यों को किसी न किसी रूप में बने रहने का लोकसम्मत अधिकार प्राप्त है। लेकिन मजे की बात यह है कि इन सभी घटकों से विशिष्ट या साधारण पाठक-श्रोता की जो आस बंधी होती है वह एक ही होती है – व्यापक सरोकारयुक्त तरोताज़गी भरा मनोरंजन। केवल तथ्यों का दुहराव-तिहराव नहीं, केवल सूचनापरकता की बोझिलता नहीं, केवल यथार्थ का मलीदा नहीं बल्कि आनंद-विभोर करनेवाली हृदय हिलोर, जो हममें सत्य का शक्ति-संचार करे, हमारे जीवन को श्रेष्ठ लक्ष्य की ओर उन्मुख करे ! इससे कम में हो सकता है पाठक-श्रोता मान भी जाये, लेकिन ऐसे में वह केवल काम चला रहा होता है, वैसे ही जैसे किसी परदेस में जब हमें खाने के लिए कुछ ढंग का नहीं मिलता तो हम चना-मूंगफली या संतरा खाकर अपने को बहला लेते हैं कि हमारे पेट में कुछ जा रहा है! हमें यह भी नहीं भूलना है प्रत्येक रचनाकार साथ-साथ एक पाठक-श्रोता भी होता है। 
हृदय हिलोर उठाने की मांग को पूरा करना प्रत्येक रचनाकार का सपना होता है, उसे इस बात की चिंता निरंतर सताती रहती है कि वह इस सपने को पूरा होते हुए देखे। लेकिन जब कभी उसे ऐसा लगता है कि वह इस उद्देश्य से काफी दूर रह गया है तो वह कुछ ऐसे उपायों को अपनाने की कोशिशें करने लगता है जिससे वह रचनाप्रसूत आह्लाद नहीं तो कम से कम उस जैसा कुछ – कोई स्थानापन्न – तैयार करने में सफल हो जाये ! इसके लिए बहुत प्रकार के प्रयास किये जाते हैं । यह ऐसा ही होता है जैसे कोई डॉक्टर किसी के केवल लक्षणों को देखकर उसी आधार पर उसका पथ्यापथ्य निश्चित कर दे!
    वास्तव में, एक संवेदनाधर्मी रचनाकार की निर्माण प्रक्रिया मानवता का, बल्कि स्वयं प्रकृति का एक विराट और दूरगामी उपक्रम है। जितने आयाम जीवन के हो सकते हैं, उतने ही एक सच्चे रचनाकार की निर्माण प्रक्रिया के भी मानने होंगे। जितना लालायित एक कंजूस अपने अमीर से अमीर होते जाने के लिए होता है और दिन-रात उसके लिए खटता रहता है, उससे कहीं ज्यादा एक रचनाकार को खटना पड़ेगा। एक श्रेष्ठ वैज्ञानिक के, एक कुशल योद्धा के निर्माण में जितनी उत्कट इच्छा शक्ति और लगन अपेक्षित हो सकती है, उससे कुछ अधिक ही रचनाकार के निर्माण में अपेक्षित रहेगी। उसे मानव को एक नया बोध, नया विचार, एक नयी दृष्टि देनी है, जो वर्तमान दृष्टिकोण से काफी सुधरी हुई होगी, समुन्नत होगी। उसे अपने मार्ग के एक-एक पत्थर को देखते समझते हुए चलना है, और जहाँ मार्ग नहीं दिख रहा है वहाँ दिखाना है, जहाँ मार्ग नहीं है वहाँ बनाना है। उसके पास सभ्य मानव के प्रत्येक प्रकार के ज्ञान और अनुभव का निचोड़ चाहिए, ताकि वह मानव की अब तक की प्रगति के साथ अपनी लेखनी में न्याय कर सके। हो सके तो उसे मानव जीवन के प्रत्येक सर्जनात्मक कर्मक्षेत्र से प्रत्यक्षत: गुजरना चाहिए, ताकि भांति भांति के वर्ण्य विषयों को उसकी लेखनी से नि:सृत होनेवाला रचनात्मक विषय बनने के लिए बार-बार उसके ड्राइंग रूम में आ आकर प्रवेश करने की तकलीफ न उठानी पड़े। एक बात यह भी है कि ड्राइंग रूम में तो उसके द्वारा आहूत भाव एवं प्रतीक ही प्रवेश करेंगे, जबकि यदि वह किसी प्राकृतिक कर्मक्षेत्र (यानी जंगल) अथवा किसी मानवीय कर्मक्षेत्र में प्रवेश करेगा तो उसे गेहूँ के साथ साथ घुन भी मिलेगा, सोने के साथ सुहागा भी!
    लेकिन यही वह स्थल है जहाँ हममें संकुचित दृष्टिकोण घर कर जाता है और हमें भरमा देता है। जैसे जीवन के अन्य क्षेत्रों में हम शार्टकट या सफलता के फार्मूलों की फिराक में रहते हैं, वैसे ही साहित्य के क्षेत्र में भी हम जल्द से जल्द सफल होने के चक्कर में चकराते पाये जाते हैं। हम भूले बैठे हैं कि हमारा स्थान किंग से भी ऊँचा है, हम तो किंग मेकर की श्रेणी में जाने के लिए मनोनीत किये गये थे, मगर कहीं से कहावत सुन ली कि “गुरु तो गुरु रह गये, चेला शक्कर हो गये” तो हमारा माथा ठनक गया! ऐसा होते ही व्यक्ति -- व्यक्ति-वैचित्र्यवाद का शिकार हो जाता है और साधारणता की भूमि से उसके पैर उखड़ जाते हैं! इसके बाद जो भी होता है उसे भलाई में तो नहीं गिना जा सकता। रचनाकारों को पहले के दिनों से भी कहीं ज्यादा इस बात से सावधान रहने की जरूरत है।
    यदि हमें सचमुच स्थायी प्रकृति का कुछ रचना है, कालजयी कहा जा सकनेवाला कुछ करना है तो स्वयं जीवन के पास जाकर उससे कुछ सीखना होगा। इस संदर्भ में कुछ समय पूर्व दिवंगत प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी की बरबस याद आती है। वे ऐसी लेखिका थीं जिन्होंने अपने जीवन और लेखन को मिलाकर इतना एक और अखंड कर दिया कि उनका जीवन ही उनका लेखन बन गया और उनका लेखन ही उनका जीवन। उन्होंने कल्पना के बजाए  बाकायदा मौका मुआयना कर करके अपने उपन्यासों के पात्र रचे, उनके जीवन को ऊर्जस्वित किया और फिर उन्हें पूरे आत्मविश्वास से ओत-प्रोत करके संसार मंच के समक्ष रखा। इसी कारण उनके पात्रों में अजब जीवंतता और जुझारूपन है। एक लेखक और उसके वास्तविक पात्रों की अंतरंगता की इससे बड़ी मिसाल कहाँ मिलेगी कि जब महाश्वेता देवी को बिरसा मुंडा के जीवन पर आधारित उपन्यास ’जंगल के दावेदार’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो  आदिवासियों ने जगह जगह ढाक बजाकर गाया- “हमें साहित्य अकादमी मिला है।” लेखिका ने मात्र संघर्ष और सहानुभूति भरी पंक्तियाँ नहीं लिखीं बल्कि अन्याय और अत्याचार की मार खा रहे लोगों के बीच जाकर उन्हें अपना निश्छल निर्मल प्रेम दिया और उनसे जीवन के अतुल पराक्रम के सूत्र सीखे! साहित्य जब घोर कर्मठता के बीच से जन्म लेता है तब उसकी अजेयता में कोई संदेह नहीं हो सकता।
    जीवन और प्रकृति – जिसने हमें उत्पन्न किया -- उसी के पास सारे रहस्यों की कुंजी है। हमारे संदर्भ में – हमारी प्रकृति का अधिकांश मानवीयता के उदात्त तत्व का बना हुआ है। इसे ही हमें समझना होगा, और सरल शब्दों में इसका अर्थ है – अपने आप को समझना। हमें पूरी नम्रता से इस बात को स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम स्वयं को ठीक से जान नहीं पाये हैं। जाहिर है कि ऐसे में दूसरों के साथ हमारे मौलिक संबंध, बल्कि ऐक्य को भी हम नहीं समझ पाये हैं। यदि ऐसा न होता तो हम हाल ही निराश न हो जाते, हाल ही खुशी से उछले न पड़ते, अपनी हार अथवा गिरावट को नकारते नहीं, आये दिन तनाव और अवसाद के नखरे न उठाते होते, अपने आसपास चारों तरफ भूख और अशिक्षा का जो बेओर-छोर समुद्र आलोढ़ित हो रहा है, उसकी उपेक्षा करके अपने को उससे अनछुआ और कटा न रखते, और अंतिम लेकिन असमाप्त बात -- अपनी रचनाओं में भूख और अशिक्षा के उस समुद्र की बेतहाशा बेसहारा तरंगों को कच्चे माल की तरह अपनी रचनाओं में इस्तेमाल करने की धृष्टता तो नहीं ही दिखाते।...जो भी हो, हमें अपने आप से ही शुरुआत करनी है – यदि हमें दूसरों पर काम करना हो – तब भी। बिना खुद को समझे दूसरों को समझने का कोई मतलब ही नहीं होता।

मुझे बनाना है एक मनुष्य
दो हाथ दो पैर वाला मनुष्य
हममें से ही लेकर एक मनुष्य
अनायास झंझटों से मुक्त एक मनुष्य
विषयुक्त सोच से हट के एक मनुष्य
प्रदूषित राजनीति से पृथक एक मनुष्य
आत्म चेतना से युक्त एक मनुष्य
संवेदना से संपृक्त एक मनुष्य
तन, मन, चेतन संयुक्त एक मनुष्य
इस अद्भुत प्रयोगशाला में बनेगा एक मनुष्य
जिसमें सबसे पहले मैं बनूंगा एक मनुष्य ।

    शिक्षा के उद्देश्य को लेकर कई तरह की बातें कहने-सुनने में आती हैं। शिक्षा को वास्तव में शिक्षा होने के लिए व्यापक मानवीय हित से चेतन रूप से संबद्ध करना होगा। इस कसौटी पर शिक्षा आज भी पूरी तरह खरी नहीं उतरती। पहले शिक्षा में सूचनाओं का, ‘इन्फर्मेशन’ का बोलबाला था। इसमें भी अब टेक्नोलॉजी घुस गयी है । इन्फर्मेशन टेक्नोलॉजी ने हर जगह अपनी पकड़ बना ली है। अब, जब एक-आध क्लिक से राह चलते ही मोबाइल इंटरनेट के जरिये कोई भी सूचना हासिल की जा सकती है, जाहिर है इन्फर्मेशन को दिमाग में कचड़े के तरह भरने की जो होड़ लगी हुई है वह बेकार है । आज की परिस्थितियों में सूचना संग्रह से कहीं ज्यादा जरूरत उसके उपयोग कौशल की है। दूसरे महत्व की बात समय प्रबंधन की है। तीसरी और सबसे महत्व की बात यह है कि सूचना का अंतिम उपयोग किस परिप्रेक्ष्य में किया जायेगा। यह सब तभी सधेगा जब हम जानकारियों को समता के साथ अनुभव और ग्रहण करनेवाला संकल्पनाशील चित्त विकसित कर सकें। इसके लिए हमें सही अर्थों में एक स्वस्थ मानव विकसित करना होगा। चाइल्ड इज़ द फादर ऑफ मैन – इस सूक्ति के अनुसार हमें अच्छे मानव के लिए अच्छा चाइल्ड विकसित करना होगा। यह तभी हो सकता है जब हम स्वयं को विकसित करें, दूसरे शब्दों में यह वर्तमान को विकसित करना है। स्वयं का परिष्कार ही वर्तमान के सुधार का पहला निर्णायक पायदान है जो भविष्य में दिखायी देगा। क्या वह सूखा पत्ता ही दोषी है जो बेजान होकर खड़क रहा है? अनेक कारणों से देश का जनमानस भटका हुआ है। या तो वह विपन्नता से ग्रस्त होकर अपने वजूद की तलाश में खर्च हुआ जा रहा है, या फिर रूढ़िवादिता अथवा पारंपरिक विश्वासों की जकड़न में फंसा है, या फिर राजनीतिक-सामाजिक पैंतरेबाजी में मसरूफ है, या फिर किसी मनगढ़ंत आत्मश्लाघा या खुशफहमी में है।... ऊपर से समाचार-मीडिया को जो करना चाहिए उससे वह बिलकुल विमुख है। जितने गैर-जिम्मेदाराना तरीके से आज पत्रकारिता की जा रही है वह सचमुच शोचनीय है। ऐसे में बीमार समाज को कुछ ऐसा देना, जो कुछ दूर तक उनका मार्ग प्रशस्त कर सके, उसमें परिस्थितियों का सामना करने का जज़्बा पैदा कर सके -  इसके लिए बहुत विशाल हृदय होने – सहस्रधार होकर बहने की जरूरत है। विशाल हृदय की पहली विशेषता यह होती है कि वह दूसरों में जड़ता और यांत्रिकता होने के प्रमाण नहीं गिनाता बल्कि अपने ही भाव-बाणों को घिसकर तेज करता रहता है।
    हमारी पत्रिका यही उद्देश्य लेकर चली है। जब एक बालिका अपने बचपन के नैसर्गिक स्वभाव को भोग रही होती है तो हम उसे अपनी पसंद का कोई भी परिधान पहना सकते हैं । परंतु जब वह धीरे-धीरे अपनी उम्र के पड़ाव पार करती जाती है तो उससे कोई कार्य करवाना कठिन होता जाता है। ठीक उसी प्रकार एक पत्रिका जब अपने बाल्यकाल में होती है, अपने स्वभाव को गढ़ रही होती है तो उसे अपनी मनपसंद और अपने बंधु-बांधवों की कहा-कही की रचनाएं शामिल करना अच्छा लगता है, कई व्यावहारिक कारणों से यह आवश्यक भी होता है। छोटी बालिका रंगबिरंगी पोशाक पहनकर शृंगार करके अपने जनों से पूछती है कि मैं कैसी लग रही हूं? कोई नई पत्रिका भी शुरू-शुरू में यह जानना चाहती है कि वह जंच रही है या नहीं; और प्रतिक्रियानुसार वह अपने आपको संशोधित करते हुए आगे बढ़ती है। लेकिन बड़ी हुई बालिका अपने स्वरूप में आने के बाद इस तरह के प्रश्नों से बचने की कोशिश करते हुए चलती है। उसमें अपने गुण-धर्म को स्वयं एक महत्ता प्रदान करने की शक्ति आ जाती है । क्या करना और कहना उसके लिए अच्छा है उसे भान हो जाता है । जब एक पत्रिका भी अपना स्वरूप ग्रहण कर लेती है तो उसमें उसके अनुरूप ही रचनाएँ शामिल करने का आग्रह आ जाता है। ऐसे में उन बंधुओं को कुछ असहजता महसूस हो सकती है जो शुरुआत में साथ चलने के आमंत्रण को यह सोचकर नज़रअंदाज कर गये कि यह हमारे ही साथ चलनेवाली पत्रिका है, भला हमें क्या दे सकती है ।
    शायर ने कहा था कि काफिलों के बसते बसते हिंदोस्तान बन गया था। यह बात कितनी सही है यह तो इतिहासवेत्ताओं का विषय है। पर जहाँ तक मरुतृण पत्रिका की बात है, काफिलों को बसते हुए देखना सचमुच सुखद है। जैसे कोई हवाई जहाज उड़ान भरने के बाद हवा में इधर-उधर झुक-झुकाकर हवा में एक गतिमय स्थिरता प्राप्त कर लेता है और अपने गंतव्य की ओर जाता है, कमोबेश वैसी ही स्थिति पत्रिका भी प्राप्त करने में उद्यत है।  
    अब की परिस्थितियों में तो यही लगता है कि वैज्ञानिकता के एक नये आलोक में प्रवेश करता हुआ युग उस साहित्य की ओर भी उन्मुख हो और कुछ कदम बढ़ाये जिसे हम चिकित्सकीय या मनोचिकित्सकीय साहित्य कहकर अभिहित कर सकें। चित्रकला और संगीतकला ने तो व्यवस्थित रूप से इस ओर अपने कदम बढ़ा ही दिये हैं, शायद अब समय आ गया है कि रंगमंच और साहित्य भी धीरे-धीरे इस ओर अपना पद-संचार शुरू करें! यानी ऐसा हो सकता है कि भविष्य में किसी व्याधियुक्त मनुष्य को स्वस्थ करने के लिए किसी विशेष श्रेणी के भावों से युक्त कविता अथवा कहानी की रचना की जाये जो उसकी अवस्था में सकारात्मक बदलाव करे।... विकसित होने के साथ ही दुनिया बहुत छोटी भी होती जा रही है। हम सबका प्रभाव विस्तार एक-दूसरे से टकरा रहा है। ऐसे में दो संभावनाएँ हैं। या तो हम अपने विस्तार को अपने ही भीतर समेटने की कोई कला विकसित करें। लेकिन ऐसा करना अप्राकृतिक है, क्रमविकास(इवॉल्यूशन) के विपरीत है और इसलिए ग्राह्य नहीं है। दूसरा उपाय यह है कि प्रभाव का विस्तार इस तरह हो कि विस्तार जितना ज्यादा हो उतना ही सुनम होता जाये, वैकल्पिक होता जाये, वातावरण से समरस होता जाये। यदि ऐसा न हुआ तो विस्तार के प्रवाह एक दूसरे में हस्तक्षेप के रूप में देखे जायेंगे, एक-दूसरे में उलझेंगे, घायल और चोटिल होंगे। बलशाली शासक होंगे और शीलबली शासित होंगे। यह समष्टि विरोधी तो है ही, मानव-धर्म की भी विरोधी दिशा है।... जब भीषण बाढ़ आती है तब सब अपने अपने को सहेजने लगते हैं। इंसान सांप से डरना भूल जाता है और सांप काटना भूल जाता है। वे अपने अपने स्वभाव में बने रहते हैं लेकिन उनका सह-अस्तित्व एक दूसरे ही मुकाम पर पहुँच जाता है। संसार को शायद ऐसी ही किसी प्रेम की बाढ़ की जरूरत हो जिसमें हम, हम रहते हुए भी दूसरे को निर्विकार भाव से स्वीकार करें। हम अस्तित्व के मूल भाव को समझें।...     
    जब कंप्यूटर वायरसों का चारागाह बन जाता है तब एक दिन हारकर हम उसे फॉरमैट कर देते हैं। तब वह फिर से नया हो जाता है। देखना है कि हमारा दिमाग ऐसा ही कोई वायरसों का चारागाह तो नहीं बन गया है? यदि हाँ, तो क्या इसे फॉरमैट करने का कोई तरीका हो सकता है? जिसमें हमारी अच्छी-बुरी सभी धारणाएँ मानो नि:शेष हो जायें और केवल सत्य-अस्तित्व यथारूप अनुभव हो? खाना पकानेवाले बर्तन-भांडे को इस्तेमाल के बाद अच्छी तरह घिसा जाता है ताकि जो खाना उसमें पकाया गया था उसका लेशमात्र भी उसमें लगा न रह जाये। हालांकि उसमें जो लगा रह जाता है वह खाने का ही अवशिष्ट होता है न कि कोई विष, फिर भी उसे पदार्थ-रहित कर दिया जाता है। बर्तन केवल बर्तन रह जाता है। बर्तन-भांडे के साथ हम यह सब करते हैं लेकिन मन तो एक ऐसा भांडा है जिसमें हम एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी तरकारी बनाते चले जाते हैं। शुचिता का हमें ध्यान ही नहीं रहता। यह दायित्व धर्म को दिया गया था, पर उसे भी लगभग बहिष्कृत कर दिया गया है। जिस तरह भांडे को खाद्य की गंध तक से रहित करके रखा जाता है, उसी तरह खुद को कुछ देर अच्छी-बुरी धारणाओं से रहित करके अंतर्मन की गहरी सच्चाई का अनुभव करना कैसा रहेगा? इस प्रक्रिया को किसी विचारधारा विशेष से न जोड़ा जाये, अपितु यह तो हर तरह के आग्रहों से ऊपर उठने का बेहतरीन उपाय है।
    जीवन के प्रत्येक पहलू में वैज्ञानिकता का समावेश करने के घोर हिमायती हम लोग मन के संदर्भ में सरासर अवैज्ञानिकता का परिचय आखिर किसलिए दे रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि विज्ञान का ‘साबू’ जीवन के तमाम पहलुओं का उद्धार करने के बाद अब वापस लौटकर हमारे सामने खड़ा है, मानो अब केवल हमारा ही उद्धार होना बाकी रह गया है? हम सचमुच वही मानव हैं क्या जिसके विषय में बड़े बड़े दावे किये गये थे? स्वर्ग के देवताओं को भी जिसका स्वागत करने के लिए भेजने की बात सोची गयी थी? यदि हम वही महिमान्वित मानव हैं, तब तो हम विज्ञान को पूरी सहमति से अपने स्वयं साथ भी वही करने देंगे जो हमने उसके सहयोग से पूरी सृष्टि के साथ किया है ! यदि हम इसमें झिझक रहे हैं तो कहीं न कहीं हमने विज्ञान की मूल प्रकृति को समझने में भूल की है। विज्ञान तो निष्पक्ष होता है, फिर विज्ञान को अपने भीतर कार्य करने देने में हमें भला क्या आपत्ति होनी चाहिए? विज्ञान तो हमारी ही आत्मा का आविष्कार रहा है? तो आज जब वह हमारी आँखों में आँखें डालकर हमसे कुछ पूछ रहा है तो हम बगलें कैसे झांक सकते हैं? इससे हमारी उस नीयत पर भी सवाल उठते हैं जो संसार को जीतने की हमारी महत्वाकांक्षा के पीछे काम कर रही थी।
    विज्ञान तो हमसे जवाब लेगा ही, बेहतर होगा कि हम स्वयं ही उसे सत्य का अनुसंधान कर लेने दें। यदि वह वास्तव में विज्ञान है तो वह हमारे आह-उह की कोई परवाह नहीं करेगा और हमारे दोषों को ऐसे हमारे सामने धर देगा जैसे कोई शल्य चिकित्सक हमारे किसी खराब अंग को हमसे काटकर हमारे सामने रखकर दिखाता है !
    आइये! सामना करें अपने सच का।    
    
-संपादक  मंडल, 
मरुतृण  साहित्य-पत्रिका

मरुतृण का वित्तीय निवेदन

एक बार हम लोग आपसे पत्रिका के लिए समय मांगने आये थे। आप में से बहुतों ने समय दिया था और दे रहे हैं, बल्कि हम आपके दिए समय के अनुसार सभी को मुद्रित पत्रिका भी नहीं दे पा रहे हैं, बस ई-बुक के रूप में वेबसाइट, ई-मेल या अन्य इलेक्ट्रोनिक माध्यम से भेज रहे हैं । आप समझ ही रहे हैं कि अर्थ की आवश्यकता होती है मुद्रण के माध्यम से पत्रिका निकालने में । इसलिए इस बार हम लोग आपसे वित्तीय सहायता की आशा के साथ सम्मुख आए हैं ।
हम यह समझते हैं कि आज के जमाने में अर्थ मांगना सबसे बड़ा अनर्थ है। क्योंकि यही तो एक सर्वप्रिय वस्तु है आज के समाज में । और किसी का भी प्रिय वस्तु मांग लेना अनर्थ ही तो है । आज समाज इसी अर्थ के पीछे भाग रहा है , इसकी मृगतृष्णा बराबर बनी हुई है। अर्थ प्राप्ति के लिए कई अनर्थों को न्योता दिया जाता रहा है और उनका जोखिम सिर पर उठाया जा रहा है। हमने सोचा, हम भी अर्थ निवेदन का छोटा सा अनर्थ करके देखें।
बात बिलकुल सीधी है - हमें केवल पत्रिका चलाने के लिए वित्तीय सहयोग की आप सभी सुधी सजग पाठकों से अपेक्षा है। मिलने को तो कुछ संस्थाओं को इतना मिलता है (सरकारी-बेसरकारी माध्यम से) कि वे उचित समय पर खर्च भी नहीं कर पाती हैं और मिला हुआ वापस भी चला जाता है । आखिर पद प्रतिष्ठा बड़ी चीज़ है! लघु-पत्रिकाओं के लिए तो वह सब एक जन्नती दरवाजा है जो उनके लिए शायद कभी खुलनेवाला नहीं है।  भले ही उनमें साहित्य के प्रसार-प्रचार में अपनी सामर्थ्य से बहुत ज्यादा पाँव पसारने का जज्बा हो। इसलिए लौट फेरकर हमें अपने आप और आप पाठकों पर ही आकर खड़ा होना पड़ता है ।
मगर अर्थ मिलता कहाँ है! कोई कैसे किसी को मांगने भर से ही अपनी प्रिय वस्तु दे दे ! ना तो हम मांगने वाले विश्वामित्र हैं और न देने वाले महाराज दशरथ, कि हमारे एक आव्हान पर अपने अर्थ पुत्रों को समाज के जंगल में हमारे साथ भेज दें। हमें यह भी ध्यान रहता है कि
"आब गई, आदर गया, नैनन गया स्नेह,
यह तीनों तब ही गए, जबकि कहा कछु देह ।"
मगर जरा सोचिए, आज के जमाने में आप हर वाजिब-गैर-वाजिब बात पर मुद्रा खर्चने लिए तैयार रहते हैं, तो किताबों और पत्रिकाओं के लिए थोड़ा-सा अर्थ खर्च करने को तैयार रहने में क्या हर्ज है? महंगाई तो बेशक है, मगर सोचिए, कहाँ-कहाँ आपसे बात-बेबात आपका अर्थ छीना जाता है, या यूँ कहिए कि ऐंठ लिया जाता है । स्वास्थ्य के नाम पर...शिक्षा के नाम पर...न्याय के नाम पर..... आदि आदि। हमारा सुझाव यह है कि आप अपने हर महीने के बजट में पुस्तकों-पत्रिकाओं को भी शामिल करने पर विचार करें, जो कि आपके खुद के विवेकपूर्ण निर्णय से हो, किसी मजबूरी से नहीं, किसी फरमान के चलते नहीं।  यह आपका आत्मनिर्णय हो। 500 रुपये या फिर 100 रुपये ही अलग से पुस्तकों और पत्रिकाओं के लिए रखना क्या आपके लिए कठिन है ? 500 रुपये हर महीने रखने से तो कुछ ही सालों में आपका घर एक छोटा-सा पुस्तकालय बन जाएगा । 6000 रुपये की पुस्तकें आप हर साल खरीद सकते हैं । अगर आप केवल 100 रुपये रखते हैं  तो केवल 1200 रुपये में आप प्रत्येक वर्ष 100 रुपये के छह संग्रह और 50 रुपये की 12 पत्रिकाएं खरीद सकते हैं । यकीन मानिए यह खर्च आपके घर परिवार को बहुत कुछ दे जाएगा और जो आपकी अगली पीढ़ी तक भी बरकरार रहेगा।
 हम में से बहुत लोग ऐसा करते भी हैं , परंतु हमें यह भी मालूम है कि अधिकतर लोग पुस्तकों के लिए पैसे अलग से रखना सोच भी नहीं सकते । अगर ऐसा न होता तो 80 बरस की आयु में पैर रखते वयोवृद्ध किसी वरिष्ठ रचनाकार को अपनी पेंशन के पैसों से पुस्तकें निकालकर मुफ्त में बांटने की जरूरत नहीं पड़ती । या फिर 28 साल की लगन से 600 पेज के किसी महाकाव्य के प्रकाशित होते ही आधी से अधिक प्रतियाँ 30 दिन में ही बिक जानी चाहिए थीं । अगर पुस्तकें घर में आ जाएँगी तो कभी न कभी उन्हें पढ़ा अवश्य जाएगा । धरती कभी वीरों से खाली नहीं होती।
ऐसे व्यक्ति जरूर हैं जो सभी जिम्मेदारियों के होते होते-सोते अपना घर जरूरतमंदों के लिए पुस्तकालय-सा बनाते रहते हैं। परंतु हम केवल ऐसे व्यक्ति का नाम सुनकर वाहवाही करके रह जाते हैं । आप ऐसे कई अच्छे-खासे पढ़े लिखे व्यक्तियों को  जानते होंगे जो केवल पाठ्यक्रम या व्यवसायपरक पुस्तकों के अलावा अन्य किसी पुस्तक को हाथ नहीं लगाना चाहते । सबसे चिंताजनक है पढ़ने के संस्कार का गायब हो जाना। ऐसे कितने ही व्यक्ति हैं जो जो अपने अध्ययन काल में साहित्य पढ़ने के आदी थे और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बढ़ने तक साहित्य मर्मज्ञ भी बने परंतु कई कारणों से अपने बच्चों में पढ़ने की वह परिपाटी स्थापित नहीं कर सके। साहित्य की सोच समझ का विकास न होना स्वस्थ बुद्धि के ह्रास का ही पर्याय है। अपने समय और परिवेश के लिए आपको साहित्य जैसा मार्गदर्शक दर्पण नहीं मिल सकता। साहित्य का सान्निध्य खोना जीवन संजीवनी का खो देना है। आज के चौतरफा तनाव के दौर में अपने आप को साहित्य के प्रकाश से प्रकाशित रखना बहुत  आवश्यक है। विकल्पहीन होकर किसी व्यावसायिक डाक्टर या मनोचिकित्सक की फीस देने से कहीं अच्छा है की साहित्य रूपी चिंतामणि में धैर्य पूर्वक निवेश किया जाता रहे।  
ऐसा करें तो हिंदी के पुस्तकों की खपत का रोना भी धीरे-धीरे बंद हो जाएगा । और अगर ये बचकानी बातें धीरे धीरे नवयुवकों के हृदय में समा गईं तो वे वैलेनटाइन डे पर भी पुस्तकें ही उपहार में भेंट करने लगेंगे। आये दिन प्रकाशक अच्छे-अच्छे लेखकों को उनका वित्तीय भाग देने से इन्कार कर यह कहते नहीं फिरेंगे कि पुस्तकें बिकती ही नहीं तो हम क्यों छापें रचनाकारों को। मगर इस समस्या का समाधान तभी संभव है जब हमारी आँखें खुल जाएँ ।
हमारी मानसिकता लिए यह है कि अपने मित्र की किताब पैसे देकर क्यों पढ़ूँ, उसे तो मुझे ऐसे ही दे देना चाहिए। हाँ! जरूर देना चाहिए अगर किताबें ऐसे ही छप जाया करतीं।  होता यह है कि वह आपको अपनी किताबें मुफ्त में दे ही देता है, संकोचवश, क्योंकि आपको जितना ख्याल पुस्तक लेने का रहता है, उससे कहीं अधिक ख्याल रहता है उसे आपको पुस्तक देने का। आपके लेखक मित्र ने तो अपना कर्तव्य निभाया,  मगर क्या हमारा-आपका कर्तव्य नहीं बनता कि उसके पॉकेट में हठपूर्वक सहयोग राशि रख दी जाए । आखिर समाज के लिए उसने जो सदुद्योग किया उसके लिए समाज आखिर क्या कर सकता है! इस विषय पर सोचना बहुत आवश्यक है। कष्टसाध्य मनोमंथन से उत्सर्जित उत्कृष्ट चिंतन का अवदान लेने की प्रक्रिया में समाज की ओर से प्रतिदान देने का जिम्मा आखिर कोई तो लेगा? हमने तो अपना संकोच तोड़ना ही अपना कर्तव्य मान लिया है कि थोड़ा एहसास करवाया जाए।  आपके द्वारा न देने और लेखकों द्वारा न लेने के संकोच को तोड़ा जाए ।
आप कहेंगे कि इससे ऐसी पुस्तकों की भरमार हो जाएगी जिनकी गुणवत्ता कम होगी, तो इसका दायित्व भी तो आप पर है कि आप उनकी पुस्तकें पढ़ें और उन्हें जानकारी दें कि क्या कमी रह गई है। इससे रचनाकार अपनी गुणवत्ता सुधारने का प्रयत्न अवश्य करेगा। वैसे भी ज्ञान अपना परिष्कार स्वयं करता है बशर्ते उसके लिए वैसी स्थितियां मौजूद हों‌। जैसे नदी अपने आप को साफ कर लेती है जब तक कि प्रदूषण एक सीमा से अधिक न हो जाए। और फिर रचनाकार भी एक दूसरे का संबल बन ही जाएंगे। सौ की एक बात यह कि जब तक पुस्तकें हर तरह की मजबूरी से ऊपर उठकर और निर्द्वंद्व भाव से खरीदकर नहीं पढ़ी जाएँगी उनका महत्व पकड़ में नहीं आएगा ।
धर्मो  रक्षति रक्षित: की तर्ज पर हमें यह कहने के लिए स्वतंत्र कर  दीजिए कि पुस्तकों की रक्षा कीजिए  ताकि पुस्तकें समाज की रक्षा कर सकें।

संपादक मंडल
मरुतृण साहित्य-पत्रिका


क्या हम सही दिशा में सोच रहे हैं?

चिंतन का विषय - शुरू शुरू में जब समझदारी एक नयी-नयी चीज़ की तरह दिखायी देती थी, तब मैंने जीवन का एक कामचलाऊ प्रारूप बना लिया था, जो जीवन ...