Sunday, 23 April 2017

हमारी बात भी सुन लीजिए

बहुत कठिन भी नहीं है डगर...

हमारी बात भी सुन लीजिए 


     किसी भी पत्रिका के लिए कोई सीमा रेखा निर्धारण करना बहती नदी को बाँधने जैसा दुस्साहस माना जा सकता है । फिर भी एक पत्रिका के जन्म लेकर आगे बढ़ने की यात्रा आरम्भ करने के साथ ही यह प्रश्न स्वाभाविक हो उठता है कि वह पत्रिका किस दिशा में जाना चाहती है, ठीक वैसे ही जैसे बालक से विनोद में कोई प्रश्न करता है कि बताओ तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो ! भले यह प्रश्न विनोद में हो, पर होता यह गंभीर है और वह बालक गंभीर-सा कई उत्तर दे देता है । मरुतृण पर भी यही प्रश्न लगातार उठना स्वाभाविक है ।  हर पाठक और शुभ-चिंतक के अपने अपने तरीके से दिये गये सुझावों पर प्रतिक्रिया देने में मरुतृण को भी बच्चे-सा ही आनंद आता है । सवाल यह उठता है कि मरुतृण कौन-सी राह अपनाए ? मरुतृण पहले से ही एक दि़शा निर्दिष्ट कर चल रही है, मस्तमौला बालक की भाँति, बिना किसी चिंता के, अपने बालचित्त व्यवहार को नैसर्गिक रूप से भोगते हुए । मरुतृण का पग हिलते-डुलते टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी पर चल रहा है । खंड-खंड कर देखने पर पता चलता है कि पहला खंड वसुधैव कुटुम्बकम्  अपना उद्देश्य अपने नाम में ही समाहित रखता है । इसमें हम विश्व की किसी अन्य भाषा से ऐसी रचनाएँ ले रहे हैं जो सार्वभौम विचारधारा की हैं और साथ ही सहज रूप से साधारण पाठकों में ग्राह्य हैं । इसमें ऐसी रचनाओं को हम ले रहे हैं जिन्हें मस्तिष्क पर बिना दबाव डाले समझा जा सके । नोबल पुरस्कार प्राप्त रचनाकारों की ऐसी ही कुछ रचनाओं को हमने चुना है । मगर नोबल पुरस्कार प्राप्त रचनाकार ही इसके मापदंड में शामिल नहीं होने चाहिए । यहाँ संवेदना और विचार प्रधान होने चाहिए जो किसी प्रांत या समुदाय के लिए न हों बल्कि मानव मात्र के लिए हों । हर व्यक्ति के साथ जुड़ी संवेदनाओं का होना हम पहली शर्त लेकर चल रहे हैं । जॉन लेलन, गैबरिएला मिस्ट्रिएल, रुमी एवं ऋषि अरविंद आदि की रचनाओं में हमने यह पाया था । आगे भी हम ऐसी रचनाओं को खोज कर सम्मिलित करते रहेंगे । दूसरी शर्त - हम सहजता को लेकर चल रहे हैं । हम आम पाठक को ध्यान में रख कर उत्कृष्ट रचनाओं को शामिल कर रहे हैं । हमने इन रचनाओं में पाया है कि उत्कृष्ट रचनाएँ सहजता लिए रह सकती हैं । तो हम सहजता के नाम पर सतही रचनाएँ भी शामिल करने से बचते रहे हैं और बचते रहेंगे ।
    एक महत्त्वपूर्ण खंड है प्रकाश-स्तंभ । इस खंड के अन्तर्गत निश्चय ही हिन्दी के महान रचनाकारों की रचनाएँ शामिल की जाती हैं जिनका प्रकाश हमेशा ही मार्ग दर्शन करने वाला है । इसमें भी हम पहली शर्त यह लेकर चल रहे हैं कि ये रचनाएँ सहज हों और एक सामान्य आदमी के लिए भी बोधगम्य हों ।
    जिन रचनाओं को लोग भूल चुके हैं या फिर बचपन में पढ़े हैं, ऐसी रचनाओं से वे फिर अपनी पुरानी दुनिया याद कर यह कहें कि हमने भी कभी इनको पढ़ा था, और उन्हें इस बात का आभास हो कि साहित्य उनके साथ कभी न कभी तो था जो आज छूट गया है । इसके माध्यम से कई लोग साहित्य से अपनी पुरानी दोस्ती को याद कर रहे हैं और यह पत्रिका कोई अजूबा नहीं  हो जाती है। अगले खंड हिन्दी-बंगला भाषा संगम में हम बंगला से कुछ सहज और महत्त्वपूर्ण रचनाओं का अनुवाद दे रहे हैं ।
    अब आता है - आगत रचनाओं में से चयन का काम, जो शबरी द्वारा उचित बेर चुनने की प्रक्रिया में सारे खट्टे और सड़े-गले बेर को स्वयं चख कर अपने आराध्य श्री राम को मीठे फल खिलाने जैसा है । आगत हर रचना को संपादक अपनी इच्छा-अनिच्छा से ऊपर उठकर  केवल इसलिए पढ़ता है कि उसे अपने प्रिय पाठकों को स्वस्थ रचनाएँ प्रदान कर सके । नीर-क्षीर अलग करने की प्रक्रिया संपादक को अपनानी पढ़ती है । इस प्रक्रिया में हम भी एक साहित्य पत्रिका के संपादक रूप में कविता, गज़ल, कहानी, ललित निबंध, विमर्श, समालोचना, अवलोकन इत्यादि के माध्यम से यथासंभव पाठकों को मानसिक स्वस्थ्यवर्धक रचनाएँ अपने आराध्य पाठकों को सौंपने की कोशिश कर रहे हैं । हाँ ! हमें पाठकों को आराध्य के रूप में ही लेना होगा । इससे  फायदा यह होगा कि हम देने के अहं से मुक्त हो जाएँगे जैसे कि अज्ञेय जी ने चेतावनी दी थी ’देने का अहंकार छोड़ो’ । दूसरी तरफ़ हमें यह भी लाभ होगा कि हम पाठकों से  कुछ पाने की आस भी नहीं रखेंगे केवल विशुद्ध प्रेम के अलावा क्योंकि पाठक वास्तव में मनुष्य रूप में होते हैं । यहाँ एक बात और स्मरण करने की आवश्यकता हो जाती है कि शबरी ने ''बेर किस पेड़ के थे'', इस पर महत्त्व नहीं दिया था, बल्कि उनके स्वस्थ, स्वादिष्ट और मीठे होने पर अपना चयन केंद्रित रखा था । एक संपादक के लिए यह चयन का कार्य अपने व्यक्तिगत संबंधों के कारण बनी सीमाओं से ऊपर उठकर करना होता है ।
    विधाओं की बात करें तो कविताओं से आगे बढ़ने पर पता चलता है कि आज के समय में कहानी जैसी विधा साधारण पाठक और लेखक को एक साथ जोड़ने का कार्य कर सकती है । कहानियाँ हमेशा से ही सबके लिए प्रिय रही हैं । अच्छी कहानियों को हम अवश्य ही पाठकों तक पहुँचाना चाहेंगे । जिससे आम पाठक यह नहीं कह पाएँ कि यह पत्रिका तो  सिर्फ साहित्य के लोगों के लिए है, हम क्यों पढ़ें?
     एक लेखिका ने कहा कि अब लोग फिर से अख़बारों की तरफ़ जाएँगे क्योंकि समाचार के जितने भी चैनल हैं उन सब में प्रयोजनमूलक समाचारों की कमी हो रही है। अनर्गल विवादों में हर दर्शक को उसकी इच्छा-अनिच्छा के विरुद्ध शामिल कर लिया जाता है । एक-एक समाचार को एक-एक चैनल अपना रिकार्ड चलाते हुए  दिनभर के लिए  लेकर बैठ जाता है । ऐसे में समाचार-पत्र ही अच्छे विकल्प के रूप में  फिर से वापस आ जाने वाले हैं । अगर टेलिविजन  जैसे सशक्त श्रव्य-दृश्य माध्यम का यही रवैया रहा तो, हमारे ख्याल से टेलिविजन के छोटे पर्दे पर दिखाए जाने वाले हर एक अनर्गल एवं भोंडे धारावाहिक यही अंजाम भुगतेंगे । दिशाहीन धारावाहिकों का  एक मात्र उद्देश्य दर्शक का ध्यानाकर्षण एवं टी.आर.पी (टेलिविजन रेटिंग पॉइंट ) बढ़ाना रह गया है जिसमें पक्षपात के माध्यम से धन-उगाही भूमिगत रूप से प्रमुख है । इनके निर्माताओं की सारी शक्ति इस बात पर व्यय हो रही है कि दर्शक यह देखने के लिए  जुड़े रहें कि अगले पल क्या घटित होने वाला है । बहुत कम ही धारावाहिक  अपनी निष्ठा को पूरी तरह खर्च कर धर्म, संस्कृति, साहित्य, वर्तमान समाज को लेकर चलते हैं जिनमें कला चाहे संगीत हो, या साज-सज्जा हो सब को मिलाकर चलने की कोशिश करते हैं । अगर इनको छोड़ दिया जाए तो सभी अपनी महान- महान संपदाओं को केवल धारावाहिक को चलाते रखने और उससे विज्ञापन पाते रहने के लिए प्रयासरत हैं । ऐसे में एक ऊब की स्थिति तैयार हो चुकी है । किसी भी वक्त लोगों का ध्यानाकर्षण एक सही दिशा में लगाने के लिए लेखकों और कलाकारों को समयानुकूल बनाया जा सकता है । अच्छी कहानियाँ और अच्छे उपन्यास लोगों के हाथों में फिर से आने के लिए तैयार हैं । जैसे दूरदर्शन के आने के पहले हुआ करता था । हाँ ! इस समय कुछ अलग प्रयास की जरूरत है क्योंकि लोगों के हाथों में स्मार्टफोन जैसे हथियार आ गये हैं । तो अवश्य ही साहित्य को उसका बड़े पैमाने पर प्रयोग करना होगा । अच्छी कहानियाँ या उपन्यासों को साधारण पाठक के हाथों में उसी मोबाइल के जरिए भी थमाने का प्रयत्न करना होगा, जिससे वे हमेशा चिपके रहते हैं । अगर हम यही रट लगाते रहें कि नई पीढ़ी अब तो मोबाइल से चिपकी रहती है तथा साहित्य और समाज से उसे कोई सरोकार नहीं है तो इसमें केवल उनका ही दोष नहीं रह जाता । हमें देखना  होगा कि आजकल सोशल मीडिया पर एक नये तरह का साहित्य उभर रहा हैं - शीघ्र पढ़ ली जाने वाली और मजेदार रचनाएँ जिनमें सामाजिक सरोकार भी उसी तरह मौजूद रहते हैं जैसे कि गंभीर साहित्य में । मगर ये अपने ही अंदाज में आ रहे हैं । जिस अंदाज को साहित्य-वर्ग इसलिए नहीं समझना चाहता कि उससे उसकी गरिमा पर चोट लग सकती है ।
    इस प्रकार की रचनाओं में एक बात और देखने को मिलती है कि जो किसी एक को मन से भा गया वह अपने बंधु-बांधवों को बिना संकोच अग्रप्रेषित ( फॉरवर्ड ) कर देता है । अच्छे साहित्य को भी, अगर वह साधारण जन को भा जाए तो वह अवश्य ही उसे आगे अपने बंधु-बांधवों के बीच साझा करेगा । मगर इसे अपनाने के लिए हमें अपने साहित्यकार होने के अहं को पहले त्यागना होगा । जो हाल आज से कुछ दिन पहले लोकप्रिय साहित्य का हुआ था और जिसे साहित्यकारों ने सीधे अपने सीने से लगाने से इन्कार ही नहीं किया था बल्कि दुत्कार भी दिया था । अब देर सबेर दिल्ली जैसे विश्वविद्यालय ने अपना दायित्व स्वीकार कर ऐसे साहित्य को अपने पाठ्यक्रम में शामिल भी कर लिया है । कविता और कहानी पाठ क्यों साधारणजन के बीच नहीं की जाती ? अह प्रश्न आज भी मुँह बाये हमारी तरफ़ देख रहा है ।
    अभी भी कुछ अंग्रेजी के लेखक अपनी किताबों को साधारण जन के हाथों थमा रहे हैं जैसे एक नये ब्रांड का टूथब्रश  लोगों के हाथों में कोई थमाता है । बस साफ करने की पद्धति में अंतर है । वह समझता है कि दांत साफ करने की जरूरत सभी को है। अंग्रेजी के लोकप्रिय साहित्यकारों को न केवल इसका आभास है बल्कि वे अपना सब कुछ दाँव पर लगा देने के लिए तत्पर हैं। वे हमारे राम और शिव जैसे चरित्र को लेकर आज की भाषा और समाज में ढालकर लोगों के पास ठकुरसुहाती पहुँचा रहे हैं और हम हैं कि बाजारवाद को बैठे-बैठे कोस रहे हैं और यह मान बैठे हैं कि साहित्य सभी के लिए नहीं हैं । और वे एक-एक पुस्तक की पचीस लाख प्रतियाँ तक बेच डालते हैं । इन पुस्तकों का साहित्यिक मूल्य भले ही नहीं हो परंतु अधिक से अधिक लोगों के पास इन पुस्तकों को पहुँचाने की कला तो हिन्दी के रचनाकारों को इनसे सीखनी ही पडे़गी । या तो फिर जिन्दगी भर रोना पड़ेगा कि अंग्रेजी साहित्य ही लोग पढ़ते हैं और हिन्दी की  पूछ ही नहीं है । हमारे साहित्यकार यह नहीं समझते कि आत्मा को साफ करने की जरूरत भी उस टूथब्रश से कम नहीं हैं ।
    हम अपने बच्चों और दोस्तों-रिश्तेदारों को रोमन लिपि में सोशल मीडिया पर लिखने से हटा कर देवनागरी लिपि पर नहीं ला सकते तो फिर हम क्या हिन्दी पढ़ाने की बात करेंगे ! भले ही हर देश की लिपि में लिखने के लिए गूगल जैसे विदेशी कंपनी ने कितने ही काम कर लिए हों । गूगल ने बोल कर हिन्दी में टाइप करने का प्रावधान कर दिया है पर हम रोमन में हिन्दी लिखना अपनी शान समझ रहे हैं तो इससे कौन बचाए ! पहले इससे तो छुटकारा पा लें उसके बाद हम सोचेंगे कि कैसे हिन्दी-साहित्य  को ई-बुक के जरिए स्मार्टफोन तक पहुँचाया जाए । देर-सबेर यह तो करना ही पड़ेगा । नहीं तो अपना मूल्यवान समय लोग विदेशी गेम खेलने में लगाते ही रहेंगे और हम देखते ही रह जाएँगे । बहुत लोग इस दिशा में अग्रसर भी हैं लेकिन हम दावे के साथ कह सकते हैं कि प्रतिष्ठित रचनाकार इस ओर ध्यान देना तो दूर, इस पर विचार करने के मूड में भी अभी तक नहीं आए हैं । लोगों के पास समय ही समय है । अब तो यात्रा में समय जैसे एकाएक नये ढंग से आ गया है । पहले लोग दैनिक-जीवन में रेल और बसों में चुपचाप आँखें मूँदकर समय काट देते थे या रेल के कमरे में ताश खेलते-खेलते ही समय काट लेते थे । मगर अब तो सब के सब गेम या मूवी में व्यस्त हो जाते हैं । मगर हम तो कहेंगे कि यह अच्छा लक्षण है कि उन्हें इस बहुमूल्य समय का एहसास हो गया है । कम से कम उन्हें पता चल गया है कि इस समय को इस्तेमाल कर कुछ किया जा सकता है भले ही वह समय गेम या सोशल मीडिया पर ही क्यों न व्यय होता हो। कितने ही लोग समय के अभाव में अपनी नौकरी, घर और बच्चों के टाईट शेड्यूल के कारण सिनेमा में नहीं जा पाते थे । लेकिन अब वे आराम से राह चलते समय का इस्तेमाल करते हुए थोड़ा-थोड़ा करके कई दिनों में एक न एक सिनेमा देख लेते हैं  । तो यह साबित हो गया कि उनके पास अब व्यस्त जीवन में भी समय है । ऐसे में उनकी रुचि का ख्याल रखते हुए ही हम किस्से-कहानियाँ और अन्य साहित्य के माध्यम से उनको अपनी रचनाएँ दे सकते हैं । यह तो मनुष्य की प्रकृति ही है कि पहले उससे उसकी पसंद की बातों को ही सुना और समझा जाए तब ही हम अपनी बातों को उससे कह सकते हैं । वर्ना पहले से ही हम अगर अपना ही राग अलापते रह जाएँ, तो हो चुकी अपनी बातों की सुनवाई ।
    ** जहाँ तक साहित्य के उद्देश्य का प्रश्न है, हमारा मानना है कि साहित्य का काम वैयक्तिक और सामाजिक, दोनों स्तरों पर स्वस्थ और श्रेष्ठ जीवन-दृष्टि प्रदान करना है। आजकल एक खास तरह के साहित्य का दौर चल पड़ा है - जो मात्र घटनाओं का निरपेक्ष इतिवृत्तात्मक (ऐज़ इट इज़) वर्णन करता है । इनमें न तो कोई संघर्ष चेतना दिखाई देती है, और न ही परिस्थितियों को बेहतरी की ओर मोड़ने की आंतरिक तड़प कराहती है । वर्तमान जीवन को क्षणिक सुकून देनेवाली तात्कालिक महत्व की युक्तियों के आधार पर भुनाये गये अवसरों की अंतहीन श्रृंखला के रूप में प्रदर्शित किया जाता है । सारा दारोमदार इस सब से उपजनेवाली मानवीय चिंतन की दुर्बलता और असहायता पर, और यदि थोड़ा और आगे बढ़ें तो उसके दुष्परिणामों को दर्शाने पर केन्द्रित कर दिया जाता है। इस प्रसंग में एक बात निर्भीकता से कहना पड़ेगा कि सभ्यता की नींव, वैयक्तिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से, ऐसे चित्त पर टिकी हुई है जिसके समक्ष जब कोई संवेग उत्पन्न होता है तो वह चित्त अपने आप को इतना अवकाश (स्पेस) देने लायक समर्थ होता है कि उसे इस संवेग के साथ बह जाना चाहिए अथवा उसके “कांटे” से अपने को अप्रभावित रखना चाहिए । संवेगों से अप्रभावित रह सकने की क्षमता मानव की सच्ची और स्थायी सभ्यता की अनिवार्य पूँजी है। अंग्रेजी में
कहावत है कि जहाँ देवता फटकने से डरते हैं वहाँ मूर्ख बेधड़क घुसते हैं। ऐसा ही एक विचार यह मिला था कि कुछ अच्छा करना चाहने वाले लोग अपने कार्य को लेकर  अक्सर शंकित रहते हैं जबकि बुरा करना चाहने वाले लोगों के इरादे पक्के होते हैं ।
    आशय यह है कि समाज का परम हितैषी होने के नाते नए रचे जा रहे साहित्य को अच्छे लोगों के अन्तर्द्वद्व को प्रतिध्वनित करना चाहिए और वह मार्ग दिखाना चाहिए जिस पर चलकर व्यक्ति और समाज स्वस्थ और श्रेष्ठ चित्त को विकसित कर सकें । चित्त के सम्मोहनकारी संवेगों के साथ बह जाना बहुत सहज और आसान ही नहीं, अमानुषिक भी है। हिंसा, बलात्कार, हत्या और आत्महत्या की बढ़ती घटनाएँ संवेगों के अंध-अनुसरण का ही परिणाम हैं। जानवर संवेगों का अनुसरण करने के लिए बाध्य हैं, उनकी प्रकृति संवेगों का उल्लंघन नहीं कर सकती । इस न्याय से मनुष्य की पहचान हुई - संवेगों की पहचान करना और उनके साथ बहने या अडिग रहने की अपनी क्षमता को सुरक्षित रखना । विशेष रूप से किसी रचना या कहानी को ही मुद्दा बनाने की बात नहीं है – चिंता की बात यह है कि इस प्रकार की प्रेरणा देनेवाली रचनाएँ अथवा कहानियाँ ईद का चाँद होती जा रही हैं !   सोचने की बात यहाँ आकर रुकती है कि साहित्यकार का वर्ण्य-विषय क्या हो! यदि लोगों में संघर्ष चेतना गायब हो रही है तो क्या आज के साहित्यकार भी संघर्ष चेतना को अपने रचना-जगत से विदा करके परोक्ष रूप से लोगों के सहयोगी बन जाएँ ? और क्या इसे उनका सहयोग कहा जाएगा ?...
    देखने में आ रहा है कि साहित्य  के नाम पर रचनाओं में एक से अधिक व्यक्तियों से केवल स्वार्थ परक आकर्षण-जन्य संबंध बनाने को दबी आवाज़ या दबे पांव स्वीकृति देने का वातावरण बनता जा रहा है या जानबूझकर बनाया जा रहा है । क्या यह वैचारिक पतन का संकेत नहीं है ? हम भी व्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता का हिमायती हैं, लेकिन उसी स्थिति में जब वैयक्तिक स्वतंत्रता सही अर्थों में वैयक्तिक स्वतंत्रता हो । यदि व्यक्ति सभी सामाजिक बंधनों से आज़ाद कर दिया जाए, तब भी वह एक पूर्णतया स्वतंत्र व्यक्ति नहीं बन जाता । यदि बाहर से पूर्ण स्वतंत्र ऐसा व्यक्ति अपनी भीतर की काम, क्रोध, प्रलोभन की वृत्तियों का गुलाम रह जाए तो यह वैयक्तिक स्वतंत्रा के नाम पर एक बहुत बड़ा और महीन धोखा है जिसे पहचानना बहुत कठिन है । यही सदैव के समान आज के साहित्यकार के समक्ष भी एक चुनौती है – सामने दिखाई दे रहे तत्काल उपलब्ध सुख और स्वार्थ के अवसर से पाठक की अन्तर्दृष्टि हटवाकर उसे सच्ची वैयक्तिक स्वतंत्रता का अमृत चखवाने का । यहाँ तथाकथित साहित्य के बहाने वैचारिक प्रदूषण की गंभीर समस्या है जिसमें किशोर एवं युवा वर्ग जाने-अनजाने शिकार हो रहे हैं । साहित्य की प्रासांगिकता समकालीन संचेतना को सही दिशा एवं दृष्टि देने में है । इस जगह खुद साहित्यकार का समग्र अनुभव और ज्ञान दांव पर हैं । ऐसा काम केवल साहित्यकार कर सकता है क्योंकि ’जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि!’ ।
    समाज के फलक पर देखा जाये तो वैयक्तिक स्वतंत्रता को कई जटिल सामाजिक संरचनाओं के साथ सामंजस्य बिठाना होता है । किसी व्यक्तिनिष्ठ आचरण का प्रभाव केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, वह समाज में यत्र-तत्र फैलता है, यदि वह व्यक्ति समाज में विशिष्ट हो तो उसके परिणाम और भी अधिक गंभीर प्रभाव डालते हैं । इसलिए स्वाभाविक ही है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता के मनोभाव को कई संशोधनों, परिष्कारों और मर्यादाओं से गुजरना होगा, सर्वहित के लिए उससे इतने त्याग की उम्मीद करना उसके साथ अन्याय नहीं कहा जा सकता, भले ही वैयक्तिक दृष्टि से कुछ हद तक ऐसी ही बात हो । यदि किसी भी प्रकार के अनुबंध के बिना समाज के सभी व्यक्ति पूरी तरह स्वतंत्र हो जायें तो समाज की वर्तमान संरचना चरमरा जायेगी और नई कोई भी वैकल्पिक संरचना हमारे पास नहीं होगी जो वैयक्तिक स्वातंत्र्य की इस बाढ़ को झेल सके । लोकतंत्र के व्यक्ति-व्यक्ति में जब तक एक ऊँचे दर्जे की संवेदनशीलता और चिंतनशीलता स्थापित न हो जाये तब तक व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को प्रतीक्षा में रहना चाहिए । आज की रोज़मर्रा की देखने-सुनने में आनेवाली घटनाएँ साफ बता रही हैं कि हमारे आज के समाज में इतनी परिपक्वता नहीं है कि उसमें पूर्ण वैयक्तिक स्वतंत्रता को व्यवहार में अपनाये जाने की बात सोची जा सके । आज वैयक्तिक स्वतंत्रता के नाम पर लिव इन रिलेशन जैसी अवस्थाएँ मनुष्य की आंतरिक शक्तियों का क्षय कर रही हैं जिसके कारण व्यक्तिगत हिंसा भी उसी अनुपात में बढ़ रही है; यही नहीं, ऐसे अमर्यादित संबंध के कारण आगे की पीढ़ी का भविष्य भी दाँव पर लग रहा है । जहाँ भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता सामाजिक मर्यादा को टक्कर मारती है, ठीक वहीं एक प्रकार की अवांछनीयता हमारे समक्ष आ खड़ी होती है। वैयक्तिक स्वतंत्रता का विचार ऊपर से जितना लुभावना दिखायी देता है, अपने अंतस में वह उतने ही बड़े जोखिम लिये हुए है।
    जहाँ वैयक्तिक स्वतंत्रता समस्त सामाजिक मर्यादाओं को अंगीकार किये हुए, समंजित रूप में प्रकट होती है, जैसे प्रात: स्मरणीय डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के जीवन के रूप में - वहाँ वह स्वयं के ही लिये नहीं, समाज के लिए भी वरदान बन जाती है । मानवीय दुर्बलताओं को किसी भी रूप में उचित ठहराने और समाज में उनकी उपस्थिति को स्वीकृत किये जाने की गुहार लगाने से बेहतर होगा कि साहित्य ऐसे विचार-रत्नों को गढ़कर और तराशकर समाज के सामने रखे जो वैयक्तिक जीवन में व्याप्त ऐसी दुर्बलताओं के परखच्चे उड़ा दें और ऐसे मानव तैयार करने की नींव रखें जो समाज में एक याद रखा जानेवाला उदाहरण बनें ! मानव जीवन अशालीन हिंदी फिल्मी गीतों की तरह चार हफ्ते बज-बजाकर भुला दिये जाने की चीज़ न बन जाये!  
    जीवन निरूद्देश्य नहीं है और न हो सकता है, हाँ, जीवन को समझ न पाये लोग जरूर निरूद्देश्य हो सकते हैं । जीवन केवल सुख-सुविधापूर्वक या अवसादपूर्वक अपनी आयु बिता देने और मर जाने का नाम नहीं है, भले ही ऐसा बिलकुल साफ नज़र आता हो, अकाट्य सत्य लगता हो ! सामाजिक रीति- रिवाज़ों के लिए वर्जित क्षेत्र में प्रवेश की हुई कुछ समकालीन कहानियों में भी इस बात की टीस महसूस की जा सकती है। इस जगह साहित्यकार को एक आविष्कारक की भूमिका में आना पड़ेगा – जो चीज़ बिलकुल भी दिखाई नहीं देती है, उसे न केवल पहचानना बल्कि प्रत्यक्ष सिद्ध करना पड़ेगा । ठीक उसी तरह, जैसे जब पृथ्वी को ज़्यादातर लोग सीधी सपाट बता रहे थे तब एक दुस्साहसी दूरदर्शी आविष्कारक ने ज़ोर देकर कहा कि पृथ्वी गोल है और सूर्य का चक्कर काटती है!
    कहा जाता है टोक्यो में इतना प्रदूषण है कि एक निश्चित समय तक कार में यात्रा करने के बाद यात्री को कार सड़क किनारे रोककर सड़क से लगे एक ऑक्सीजन कक्ष में जाकर खुद को कुछ देर के लिए रखना पड़ता है । उसके बाद वह बाहर आकर पुन: अपनी यात्रा पर आगे चल देता है। इसी तरह जो जहर पहले से ही भारतीय मानस के वातावरण में है, “मरुतृण” उसकी पुनरावृत्ति करना नहीं चाहेगा। वह ऑक्सीजन कक्ष की भूमिका निभाना अपना धर्म मानेगा, और छुरे की धार पर चलने का आकांक्षी रहेगा।
    यदि संवेगों से कुचले मानव को उबारकर नई अन्तर्दृष्टि देनेवाली कोई रचना आपके पास हो तो हमें उसे प्रकाशित करने में हार्दिक गौरव का अनुभव होगा। इस संपादकीय में व्यक्त की गयी बातों के प्रसंग में आप हमें अपनी राय से अवगत कराएँ, अपने दीर्घकालव्यापी अनुभव से हमें समृद्ध करें - यह हमारी हार्दिक इच्छा रहेगी।  
   
हमारा हार्दिक नमन्    
- संपादक मंडल
मरुतृण साहित्य- पत्रिका

3 comments:

  1. बहुत ही प्रासंगिक आलेख। सजग दृष्टि का परिचायक।

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  2. आपकी प्रखर दृष्टि बनी रहे ।

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  3. बहुत बहुत धन्यवाद आपका महोदय। देर से उत्तर देने के लिए हमें खेद है। अब से जल्द से जल्द उत्तर दिया जा सके इसकी व्यवस्था की जा रही है धन्यवाद

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